Munshi Premchand Hindi Kahani Do Shkhiyan

  


दो सखियाँ


1

 

 

लखनऊ

1-7-25

 

 

प्यारी बहन,

जब से यहाँ आयी हूँतुम्हारी याद सताती रहती है। काश! तुम कुछ दिनों के लिए यहाँ चली आतींतो कितनी बहार रहती। मैं तुम्हें अपने विनोद से मिलाती। क्या यह सम्भव नहीं है तुम्हारे माता-पिता क्या तुम्हें इतनी आजादी भी न देंगे मुझे तो आश्चर्य यही है कि बेड़ियाँ पहनकर तुम कैसे रह सकती हो! मैं तो इस तरह घण्टे-भर भी नहीं रह सकती। ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि मेरे पिताजी पुरानी लकीर पीटने वालों में नहीं। वह उन नवीन आदर्शों के भक्त हैंजिन्होंने नारी-जीवन को स्वर्ग बना दिया है। नहीं तो मैं कहीं की न रहती।

विनोद हाल ही में इंग्लैंड से डी0 फिल0 होकर लौटे हैं और जीवन-यात्रा आरम्भ करने के पहले एक बार संसार-यात्रा करना चाहते हैं। योरप का अधिकांश भाग तो वह देख चुके हैंपर अमेरिकाआस्ट्रेलिया और एशिया की सैर किये बिना उन्हें चैन नहीं। मध्य एशिया और चीन का तो यह विशेष रूप से अध्ययन करना चाहते हैं। योरोपियन यात्री जिन बातों की मीमांसा न कर सकेउन्हीं पर प्रकाश डालना इनका ध्येय है। सच कहती हूँचन्दाऐसा साहसीऐसा निर्भीकऐसा आदर्शवादी पुरुष मैंने कभी नहीं देखा था। मैं तो उनकी बातें सुनकर चकित हो जाती हूँ। ऐसा कोई विषय नहीं हैजिसका उन्हें पूरा ज्ञान न होजिसकी वह आलोचना न कर सकते होऔर यह केवल किताबी आलोचना नहीं होतीउसमें मौलिकता और नवीनता होती है। स्ववन्त्रता के तो वह अनन्य उपासक हैं। ऐसे पुरुष की पत्नी बनकर ऐसी कौन-सी स्त्री हैजो अपने सौभाग्य पर गर्व न करे। बहनतुमसे क्या कहूँ कि प्रात:काल उन्हें अपने बँगले की ओर आते देखकर मेरे चित्त की क्या दशा हो जाती है। यह उन पर न्योछावर होने के लिए विकल हो जाता है। यह मेरी आत्मा में बस गये हैं। अपने पुरुष की मैंने मन में जो कल्पना की थीउसमें और उनमें बाल बराबर भी अन्तर नहीं। मुझे रात-दिन यही भय लगा रहता है कि कहीं मुझमें उन्हें कोई त्रुटि न मिल जाय। जिन विषयों से उन्हें रुचि हैउनका अध्ययन आधी रात तक बैठी किया करती हूँ। ऐसा परिश्रम मैंने कभी न किया था। आईने-कंघी से मुझे कभी उतना प्रेम न थासुभाषितों को मैंने कभी इतने चाव से कण्ठ न किया था। अगर इतना सब कुछ करने पर भी मैं उनका हृदय न पा सकीतो बहनमेरा जीवन नष्ट हो जायेगामेरा हृदय फट जायेगा और संसार मेरे लिए सूना हो जायेगा।

कदाचित् प्रेम के साथ ही मन में ईर्ष्या का भाव भी उदय हो जाता है। उन्हें मेरे बँगले की ओर जाते हुए देख जब मेरी पड़ोसिन कुसुम अपने बरामदे में आकर खड़ी हो जाती हैतो मेरा ऐसा जी चाहता है कि उसकी आँखें ज्योतिहीन हो जायँ। कल तो अनर्थ ही हो गया। विनोद ने उसे देखते ही हैट उतार ली और मुस्कराए। वह कुलटा भी खीसें निकालने लगी। ईश्वर सारी विपत्तियाँ देपर मिथ्याभिमान न दे। चुड़ैलों की-सी तो आपकी सूरत हैपर अपने को अप्सरा समझती हैं। आप कविता करती हैं और कई पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ छप भी गई हैं। बसआप जमीन पर पाँव नहीं रखतीं। सच कहती हूँथोड़ी देर के लिए विनोद पर से मेरी श्रद्धा उठ गयी। ऐसा आवेश होता था कि चलकर कुसुम का मुँह नोच लूँ। खैरियत हुई कि दोनों में बातचलत न हुईपर विनोद आकर बैठे तो आध घण्टे तक मैं उनसे न बोल सकीजैसे उनके शब्दों में वह जादू ही न थावाणी में वह रस ही न था। तब से अब तक मेरे चित्त की व्यग्रता शान्त नहीं हुई। रात-भर मुझे नींद नहीं आयीवही दृश्य आँखों के सामने बार-बार आता था। कुसुम को लज्जित करने के लिए कितने मसूबे बाँध चुकी हूँ। अगर यह भय न होता कि विनोद मुझे ओछी और हलकी समझेंगेतो मैं उनसे अपने मनोभावों को स्पष्ट कह देती। मैं सम्पूर्णत: उनकी होकर उन्हें सम्पूर्णत: अपना बनाना चाहती हूँ। मुझे विश्वास है कि संसार का सबसे रूपवान् युवक मेरे सामने आ जायतो मैं उसे आँख उठाकर न देखूँगी। विनोद के मन में मेरे प्रति यह भाव क्यों नहीं है।

चन्दाप्यारी बहनएक सप्ताह के लिए आ जा। तुझसे मिलने के लिए मन अधीर हो रहा है। मुझे इस समय तेरी सलाह और सहानुभूति की बड़ी जरूरत है। यह मेरे जीवन का सबसे नाजुक समय है। इन्हीं दस-पाँच दिनों में या तो पारस हो जाऊँगी या मिट्टी। लो सात बज गए और अभी बाल तक नहीं बनाये। विनोद के आने का समय है। अब विदा होती हूँ। कहीं आज फिर अभागिनी कुसुम अपने बरामदे में न आ खड़ी हो। अभी से दिल काँप रहा है। कल तो यह सोचकर मन को समझाया था कि यों ही सरल भाव से वह हँस पड़ी होगी। आज भी अगर वही दृश्य सामने आयातो उतनी आसानी से मन को न समझा सकूँगी।

तुम्हारी,

पद्मा

 

2

 

गोरखपुर

5-7-25

 

 

प्रिय पद्मा,

भला एक युग के बाद तुम्हें मेरी सुधि तो आई। मैंने तो समझा थाशायद तुमने परलोक-यात्रा कर ली। यह उस निष्ठुरता का दंड ही हैजो कुसुम तुम्हें दे रही है। 15 एप्रिल को कालेज बन्द हुआ और एक जुलाई को आप खत लिखती हैं—पूरे ढाई महीने बादवह भी कुसुम की कृपा से। जिस कुसुम को तुम कोस रही होउसे मैं आशीर्वाद दे रही हूँ। वह दारुण दु:ख की भाँति तुम्हारे रास्ते में न आ खड़ी होतीतो तुम्हें क्यों मेरी याद आती खैरविनोद की तुमने जो तसवीर खींचीवह बहुत ही आकर्षक है और मैं ईश्वर से मना रही हूँवह दिन जल्द आए कि मैं उनसे बहनोई के नाते मिल सकूँ। मगर देखनाकहीं सिविल मैरेज न कर बैठना। विवाह हिन्दू-पद्धति के अनुसार ही हो। हॉतुम्हें अख्त्यिर है जो सैकड़ों बेहूदा और व्यर्थ के कपड़े हैंउन्हें निकाल डालो। एक सच्चेविद्वान पण्डित को अवश्य बुलानाइसलिए नहीं कि वह तुमसे बात-बात पर टके निकलवायेबल्कि इसलिए कि वह देखता रहे कि वह सब कुछ शास्त्र-विधि से हो रहा हैया नहीं।

अच्छाअब मुझसे पूछो कि इतने दिनों क्यों चुप्पी साधे बैठी रही। मेरे ही खानदान में इन ढाई महीनों मेंपाँच शादियॉँ हुई। बारातों का ताँता लगा रहा। ऐसा शायद ही कोई दिन गया हो कि एक सौ महमानों से कम रहे हों और जब बारात आ जाती थीतब तो उनकी संख्या पाँच-पाँच सौ तक पहुँच जाती थी। ये पाँचों लड़कियाँ मुझसे छोटी हैं और मेरा बस चलता तो अभी तीन-चार साल तक न बोलतीलेकिन मेरी सुनता कौन है और विचार करने पर मुझे भी ऐसा मालूम होता है कि माता-पिता का लड़कियों के विवाह के लिए जल्दी करना कुछ अनुचित नहीं है। जिन्दगी का कोई ठिकाना नहीं। अगर माता-पिता अकाल मर जायँतो लड़की का विवाह कौन करे। भाइयों का क्या भरोसा। अगर पिता ने काफी दौलत छोड़ी है तो कोई बात नहींलेकिन जैसा साधारणत: होता हैपिता ऋण का भार छोड़ गयेतो बहन भाइयों पर भार हो जाती है। यह भी अन्य कितने ही हिन्दू-रस्मों की भाँति आर्थिक समस्या हैऔर जब तक हमारी आर्थिक दशा न सुधरेगीयह रस्म भी न मिटेगी।

अब मेरे बलिदान की बारी है। आज के पंद्रहवें दिन यह घर मेरे लिए विदेश हो जायगा। दो-चार महीने के लिए आऊँगीतो मेहमान की तरह। मेरे विनोद बनारसी हैंअभी कानून पढ़ रहे हैं। उनके पिता नामी वकील हैं। सुनती हूँकई गाँव हैंकई मकान हैंअच्छी मर्यादा है। मैंने अभी तक वर को नहीं देखा। पिताजी ने मुझसे पुछवाया था कि इच्छा होतो वर को बुला दूँ। पर मैंने कह दियाकोई जरूरत नहीं। कौन घर में बहू बने। है तकदीर ही का सौदा। न पिताजी ही किसी के मन में पैठ सकते हैंन मैं ही। अगर दो-एक बार देख ही लेतीनहीं मुलाकात ही कर लेती तो क्या हम दोनों एक-दूसरे को परख लेते यह किसी तरह संभव नहीं। ज्यादा-से-ज्यादा हम एक-दूसरे का रंग-रूप देख सकते हैं। इस विषय में मुझे विश्वास है कि पिताजी मुझसे कम संयत नहीं हैं। मेरे दोनों बड़े बहनोई सौंदर्य के पुतले न हों पर कोई रमणी उनसे घृणा नहीं कर सकती। मेरी बहनें उनके साथ आनन्द से जीवन बिता रही हैं। फिर पिताजी मेरे ही साथ क्यों अन्याय करेंगे। यह मैं मानती हूँ कि हमारे समाज में कुछ लोगों का वैवाहिक जीवन सुखकर नहीं हैलेकिन संसार में ऐसा कौन समाज हैजिसमें दुखी परिवार न हों। और फिर हमेशा पुरुषों ही का दोष तो नहीं होताबहुधा स्त्रियॉँ ही विष का गाँठ होती हैं। मैं तो विवाह को सेवा और त्याग का व्रत समझती हूँ और इसी भाव से उसका अभिवादन करती हूँ। हाँमैं तुम्हें विनोद से छीनना तो नहीं चाहती लेकिन अगर 20 जुलाई तक तुम दो दिन के लिए आ सकोतो मुझे जिला लो। ज्यों-ज्यों इस व्रत का दिन निकट आ रहा हैमुझे एक अज्ञात शंका हो रही हैमगर तुम खुद बीमार होमेरी दवा क्या करोगी—जरूर आना बहन !

तुम्हारी,

चन्दा

 

3

 

मंसूरी

5-8-25

 

 

प्यारी चन्दा,

सैंकड़ों बातें लिखनी हैंकिस क्रम से शुरू करूँसमझ में नहीं आता। सबसे पहले तुम्हारे विवाह के शुभ अवसर पर न पहुँच सकने के लिए क्षमा चाहती हूँ। मैं आने का निश्चय कर चुकी थीमैं और प्यारी चंदा के स्वयंवर में न जाऊँ: मगर उसके ठीक तीन दिन पहले विनोद ने अपना आत्मसमर्पण करके मुझे ऐसा मुग्ध कर दिया कि फिर मुझे किसी की सुधि न रही। आह! वे प्रेम के अन्तस्तल से निकले हुए उष्णआवेशमय और कंपित शब्द अभी तक कानों में गूँज रहे हैं। मैं खड़ी थीऔर विनोद मेरे सामने घुटने टेके हुए प्रेरणाविनय और आग्रह के पुतले बने बैठे थे। ऐसा अवसर जीवन में एक ही बार आता हैकेवल एक बारमगर उसकी मधुर स्मृति किसी स्वर्ग-संगीत की भाँती जीवन के तार-तार में व्याप्त रहता है। तुम उस आनन्द का अनुभव कर सकोगी—मैं रोने लगीकह नहीं सकतीमन में क्या-क्या भाव आयेपर मेरी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। कदाचित् यही आनन्द की चरम सीमा है। मैं कुछ-कुछ निराश हो चली थी। तीन-चार दिन से विनोद को आते-जाते कुसुम से बातें करते देखती थीकुसुम नित नए आभूषणों से सजी रहती थी और क्या कहूँएक दिन विनोद ने कुसुम की एक कविता मुझे सुनायी और एक-एक शब्द पर सिर धुनते रहे। मैं मानिनी तो हूँ हीसोचा,जब यह उस चुड़ैल पर लट्टू हो रहे हेंतो मुझे क्या गरज पड़ी है कि इनके लिए अपना सिर खपाऊँ। दूसरे दिन वह सबेरे आयेतो मैंने कहला दियातबीयत अच्छी नहीं है। जब उन्होंने मुझसे मिलने के लिए आग्रह कियातब विवश होकर मुझे कमरे में आना पड़ा। मन में निश्चय करके आयी थी—साफ कह दूंगी अब आप न आया कीजिए। मैं आपके योग्य नहीं हूँमैं कवि नहींविदुषी नहींसुभाषिणी नहीं....एक पूरी स्पीच मन में उमड़ रही थीपर कमरे में आई और विनोद के सतृष्ण नेत्र देखेप्रबल उत्कंठा में काँपते हुए होंठ—बहनउस आवेश का चित्रण नहीं कर सकती। विनोद ने मुझे बैठने भी न दिया। मेरे सामने घुटनों के बल फर्श पर बैठ गये और उनके आतुर उन्मत्त शब्द मेरे हृदय को तरंगित करने लगे।

एक सप्ताह तैयारियों में कट गया। पापा ओर मामा फूले न समाते थे।

और सबसे प्रसन्न थी कुसुम ! यही कुसुम जिसकी सूरत से मुझे घृणा थी ! अब मुझे ज्ञात हुआ कि मैंने उस पर सन्देह करके उसके साथ घोर अन्याय किया। उसका हृदय निष्कपट हैउसमें न ईर्ष्या हैन तृष्णासेवा ही उसके जीवन का मूलतत्व है। मैं नहीं समझती कि उसके बिना ये सात दिन कैसे कटते। मैं कुछ खोई-खोई सी जान पड़ती थी। कुसुम पर मैंने अपना सारा भार छोड़ दिया था। आभूषणों के चुनाव और सजाववस्त्रों के रंग और काट-छाँट के विषय में उसकी सुरुचि विलक्षण है। आठवें दिन जब उसने मुझे दुलहिन बनायातो मैं अपना रूप देखकर चकित रह गई। मैंने अपने को कभी ऐसी सुन्दरी न समझा था। गर्व से मेरी आँखों में नशा-सा छा गया।

उसी दिन संध्या-समय विनोद और में दो भिन्न जल-धाराओं की भाँति संगम पर मिलकर अभिन्न हो गये। विहार-यात्रा की तैयारी पहले ही से हो चुकी थीप्रात:काल हम मंसूरी के लिए रवाना हो गये। कुसुम हमें पहुँचाने के लिए स्टेशन तक आई और विदा होते समय बहुत रोयी। उसे साथ ले चलना चाहती थीपर न जाने क्यों वह राजी न हुई।

मंसूरी रमणीक हैइसमें सन्देह नहीं। श्यामवर्ण मेघ-मालाएँ पहाड़ियों पर विश्राम कर रही हैंशीतल पवन आशा-तरंगों की भाँति चित्त का रंजन कर रहा हैपर मुझे ऐसा विश्वास है कि विनोद के साथ मैं किसी निर्जन वन में भी इतने ही सुख से रहती। उन्हें पाकर अब मुझे किसी वस्तु की लालसा नहीं। बहनतुम इस आनन्दमय जीवन की शायद कल्पना भी न कर सकोगी। सुबह हुईनाश्ता आयाहम दोनों ने नाश्ता कियाडाँडी तैयार हैनौ बजते-बजते सैर करने निकल गए। किसी जल-प्रपात के किनारे जा बैठे। वहाँ जल-प्रवाह का मधुर संगीत सुन रहे हैं। या किसी शिला-खंड पर बैठे मेघों की व्योम-क्रीड़ा देख रहे हैं। ग्यारह बजते-बजते लौटै। भोजन किया। मैं प्यानो पर जा बैठी। विनोद को संगीत से प्रेम है। खुद बहुत अच्छा गाते हैं और मैं गाने लगती हूँतब तो वह झूमने ही लगते हैं। तीसरे पहर हम एक घंटे के लिए विश्राम  करके खेलने या कोई खेल देखने चले जाते हैं। रात को भोजन करने के बाद थियेटर देखते हैं और वहाँ से लौट कर शयन करते हैं। न सास की घुड़कियाँ हैं न ननदों की कानाफूसीन जेठानियों के ताने। पर इस सुख में भी मुझे कभी-कभी एक शंका-सी होती है—फूल में कोई काँटा तो नहीं छिपा हुआ हैप्रकाश के पीछे कहीं अन्धकार तो नहीं है ! मेरी समझ में नहीं आताऐसी शंका क्यों होती है। अरेयह लो पाँच बज गएविनोद तैयार हैंआज टेनिस का मैच देखने जाना है। मैं भी जल्दी से तैयार हो जाऊँ। शेष बातें फिर लिखूँगी।

हाँएक बात तो भूली ही जा रही थी। अपने विवाह का समाचार लिखना। पतिदेव कैसे हैं रंग-रूप कैसा है ससुराल गयीया अभी मैके ही में हो ससुराल गयींतो वहाँ के अनुभव अवश्य लिखना। तुम्हारी खूब नुमाइश हुई होगी। घरकुटुम्ब और मुहल्ले की  महिलाओं ने घूँघट उठा-उठाकर खूब मुँह देखा होगाखूब परीक्षा हुई होगी। ये सभी बातें विस्तार से लिखना। देखें कब फिर मुलाकात होती है।

तुम्हारी,

पद्मा

 

4

 

गोरखपुर

1-9-25

 

 

प्यारी पद्मा,

तुम्हारा पत्र पढ़कर चित्त को बड़ी शांति मिली। तुम्हारे न आने ही से मैं समझ गई थी कि विनोद बाबू तुम्हें हर ले गएमगर यह न समझी थी कि तुम मंसूरी पहुँच गयी। अब उस आमोद-प्रमोद में भला गरीब चन्दा क्यों याद आने लगी। अब मेरी समझ में आ रहा है कि विवाह के लिए नए और पुराने आदर्श में क्या अन्तर है। तुमने अपनी पसन्द से काम लियासुखी हो। मैं लोक-लाज की दासी बनी रहीनसीबों को रो रही हूँ।

अच्छाअब मेरी बीती सुनो। दान-दहेज के टंटे से तो मुझे कुछ मतलब है नहीं। पिताजी ने बड़ा ही उदार-हृदय पाया है। खूब दिल खोलकर दिया होगा। मगर द्वार पर बारात आते ही मेरी अग्नि-परीक्षा शुरू हो गयी। कितनी उत्कण्ठा थी—वह-दर्शन कीपर देखूँ कैसे। कुल की नाक न कट जाएगी। द्वार पर बारात आयी। सारा जमाना वर को घेरे हुए था। मैंने सोचा—छत पर से देखूँ। छत पर गयीपर वहाँ से भी कुछ न दिखाई दिया। हाँइस अपराध के लिए अम्माँजी की घुड़कियाँ सुननी पड़ीं। मेरी जो बात इन लोगों को अच्छी नहीं लगतीउसका दोष मेरी शिक्षा के माथे मढ़ा जाता है। पिताजी बेचारे मेरे साथ बड़ी सहानुभूति रखते हैं। मगर किस-किस का मुँह पकड़ें। द्वारचार तो यों गुजरा और भाँवरों की तैयारियाँ होने लगी। जनवासे से गहनों और कपड़ों का थाल आया। बहन ! सारा घर—स्त्री-पुरुष—सब उस पर कुछ इस तरह टूटेमानो इन लोगों ने कभी कुछ देखा ही नहीं। कोई कहता हैकंठा तो लाये ही नहींकोई हार के नाम को रोता है! अम्माँजी तो सचमुच रोने लगीमानो मैं डुबा दी गयी। वर-पक्षवालों की दिल खोलकर निंदा होने लगी। मगर मैंने गहनों की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा। हाँजब कोई वर के विषय में कोई बात करता थातो मैं तन्मय होकर सुनने लगती था। मालूम हुआ—दुबले-पतले आदमी हैं। रंग साँवला हैआँखें बड़ी-बड़ी हैंहँसमुख हैं। इन सूचनाओं से दशर्नोत्कंठा और भी प्रबल होती थी। भाँवरों का मुहूर्त ज्यों-ज्यों समीप आता थामेरा चित्त व्यग्र होता जाता था। अब तक यद्यपि मैंने उनकी झलक भी न देखी थीपर मुझे उनके प्रति एक अभूतपूर्व प्रेम का अनुभव हो रहा था। इस वक्त यदि मुझे मालूम हो जाता कि उनके दुश्मनों को कुछ हो गया हैतो मैं बावली हो जाती। अभी तक मेरा उनसे साक्षात् नहीं हुआ हैंमैंने उनकी बोली तक नहीं सुनी हैलेकिन संसार का सबसे रूपवान् पुरुष भीमेरे चित्त को आकर्षित नहीं कर सकता। अब वही मेरे सर्वस्व हैं।

आधी रात के बाद भाँवरें हुईं। सामने हवन-कुण्ड थादोनों ओर विप्रगण बैठे हुए थेदीपक जल रहा थाकुल देवता की मूर्ति रखी हुई थीं। वेद मंत्र का पाठ हो रहा था। उस समय मुझे ऐसा मालूम हुआ कि सचमुच देवता विराजमान हैं। अग्निवायुदीपकनक्षत्र सभी मुझे उस समय देवत्व की ज्योति से प्रदीप्त जान पड़ते थे।  मुझे पहली बार आध्यात्मिक विकास का परिचय मिला। मैंने जब अग्नि के सामने मस्तक झुकायातो यह कोरी रस्म की पाबंदी न थीमैं अग्निदेव को अपने सम्मुख मूर्तिवान्स्वर्गीय आभा से तेजोमय देख रही थी। आखिर भाँवरें भी समाप्त हो गईपर  पतिदेव के दर्शन न हुए।

अब अन्तिम आशा यह थी कि प्रात:काल जब पतिदेव कलेवा के लिए बुलाये जायँगेउस समय देखूँगी। तब उनके सिर पर मौर न होगासखियों के साथ मैं भी जा बैठूँगी और खूब जी भरकर देखूँगी। पर क्या मालूम था कि विधि कुछ और ही कुचक्र रच रहा है। प्रात:काल देखती हूँतो जनवासे के खेमे उखड़ रहे हैं। बात कुछ न थी। बारातियों के नाश्ते के लिए जो सामान भेजा गया थावह काफी न था। शायद घी भी खराब था। मेरे पिताजी को तुम जानती ही हो। कभी किसी से दबे नहींजहाँ रहे शेर बनकर रहे। बोले—जाते हैंतो जाने दोमनाने की कोई जरूरत नहींकन्यापक्ष का धर्म है बारातियों का सत्कार करनालेकिन सत्कार का यह अर्थ नहीं कि धमकी और रोब से काम लिया जायमानो किसी अफसर का पड़ाव हो। अगर वह अपने लड़के की शादी कर सकते हैंतो मैं भी अपनी लड़की की शादी कर सकता हूँ।

बारात चली गई और मैं पति के दर्शन न कर सकी ! सारे शहर में हलचल मच गई। विरोधियों को हँसने का अवसर मिला। पिताजी ने बहुत सामान जमा किया था। वह सब खराब हो गया। घर में जिसे देखिएमेरी ससुराल की निंदा कर रहा है—उजड्ड हैंलोभी हैंबदमाश हैंमुझे जरा भी बुरा नहीं लगता। लेकिन पति के विरुद्ध मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहती। एक दिन अम्माँजी बोली—लड़का भी बेसमझ है। दूध पीता बच्चा नहींकानून पढ़ता हैमूँछ-दाढ़ी आ गई हैउसे अपने बाप को समझाना चाहिए था कि आप लोग क्या कर रहे हैं। मगर वह भी भीगी बिल्ली बना रहा। मैं सुनकर तिलमिला उठी। कुछ बोली तो नहींपर अम्माँजी को मालूम जरूर हो गया कि इस विषय में मैं उनसे सहमत नहीं। मैं तुम्हीं से पूछती हूँ बहनजैसी समस्या उठ खड़ी हुई थीउसमें उनका क्या धर्म था अगर वह अपने पिता और अन्य सम्बन्धियों का कहना न मानतेतो उनका अपमान न होता उस वक्त उन्होंने वही कियाजो उचित था। मगर मुझे विश्वास है कि जरा मामला ठंडा होने पर वह आयेंगे। मैं अभी से उनकी राह देखने लगी हूँ। डाकिया चिट्ठियाँ लाता हैतो दिल में धड़कन होने लगती हैं—शायद उनका पत्र भी हो ! जी में बार-बार आता हैक्यों न मैं ही एक खत लिखूँमगर संकोच में पड़कर रह जाती हूँ। शायद मैं कभी न लिख सकूँगी। मान नहीं है केवल संकोच है। पर हाँअगर दस-पाँच दिन और उनका पत्र न आयाया वह खुद न आएतो संकोच मान का रूप धारण कर लेगा। क्या तुम उन्हें एक चिट्ठी नहीं लिख सकती ! सब खेल बन जाय। क्या मेरी इतनी खातिर भी न करोगी मगर ईश्वर के लिए उस खत में कहीं यह न लिख देना कि चंदा ने प्रेरणा की है। क्षमा करना ऐसी भद्दी गलती कीतुम्हारी ओर से शंका करके मैं तुम्हारे साथ अन्याय कर रही हूँमगर मैं समझदार थी ही कब ?

 

तुम्हारी,

चन्दा

 

5

 

 

मंसूरी

20-9-25

 

 

प्यारी चन्दा,

मैंने तुम्हारा खत पाने के दूसरे ही दिन काशी खत लिख दिया था। उसका जवाब भी मिल गया। शायद बाबूजी ने तुम्हें खत लिखा हो। कुछ पुराने खयाल के आदमी हैं। मेरी तो उनसे एक दिन भी न निभती। हाँतुमसे निभ जायगी। यदि मेरे पति ने मेरे साथ यह बर्ताव किया होता—अकारण मुझसे रूठे होते—तो मैं जिन्दगी-भर उनकी सूरत न देखती। अगर कभी आते भीतो कुत्तों की तरह दुत्कार देती। पुरुष पर सबसे बड़ा अधिकार उसकी स्त्री का है। माता-पिता को खुश रखने के लिए वह स्त्री का तिरस्कार नहीं कर सकता। तुम्हारे ससुरालवालों ने बड़ा घृणित व्यवहार किया। पुराने खयालवालों का गजब का कलेजा हैजो ऐसी बातें सहते हैं। देखा उस प्रथा का फलजिसकी तारीफ करते तुम्हारी जबान नहीं थकती। वह दीवार सड़ गई। टीपटाप करने से काम न चलेगा। उसकी जगह नये सिरे से दीवार बनाने की जरूरत है।

 

अच्छाअब कुछ मेरी भी कथा सुन लो। मुझे ऐसा संदेह हो रहा है कि विनोद ने मेरे साथ दगा की है। इनकी आर्थिक दशा वैसी नहींजैसी मैंने

 

 

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दो सखियाँ

समझी थी। केवल मुझे ठगने के लिए इन्होंने सारा स्वाँग भरा था। मोटर माँगे की थीबँगले का किराया अभी तक नहीं दिया गयाफरनिचर किराये के थे। यह सच है कि इन्होंने प्रत्यक्ष रूप से मुझे धोखा नहीं दिया। कभी अपनी दौलत की डींग नहीं मारीलेकिन ऐसा रहन-सहन बना लेनाजिससे दूसरों को अनुमान हो कि यह कोई बड़े धनी आदमी हैंएक प्रकार का धोखा ही है। यह स्वाँग इसीलिए भरा गया था कि कोई शिकार फँस जाय। अब देखती हूँ कि विनोद मुझसे अपनी असली हालत को छिपाने का प्रयत्न किया करते हैं। अपने खत मुझे नहीं देखने देतेकोई मिलने आता हैतो चौंक पड़ते हैं और घबरायी हुई आवाज में बेरा से पूछते हैंकौन है तुम जानती होमैं धन की लौंडी नहीं। मैं केवल विशुद्ध हृदय चाहती हूँ। जिसमें पुरुषार्थ हैप्रतिभा हैवह आज नहीं तो कल अवश्य ही धनवान् होकर रहेगा। मैं इस कपट-लीला से जलती हूँ। अगर विनोद मुझसे अपनी कठिनाइयाँ कह देंतो मैं उनके साथ सहानुभूति करूँगीउन कठिनाइयों को दूर करने में उनकी मदद करूँगी। यों मुझसे परदा करके यह मेरी सहानुभूती और सहयोग ही से हाथ नहीं धोतेमेरे मन में अविश्वासद्वेष और क्षोभ का बीज बोते हैं। यह चिंता मुझे मारे डालती हैं। अगर इन्होंने अपनी दशा साफ-साफ बता दी होतीतो मैं यहाँ मंसूरी आती ही क्यों लखनऊ में ऐसी गरमी नहीं पड़ती कि आदमी पागल हो जाय। यह हजारों रुपये क्यों पानी पड़ता। सबसे कठिन समस्या जीविका की है। कई विद्यालयों में आवेदन-पत्र भेज रखे हैं।जवाब का इंतजार कर रहे हैं। शायद इस महीने के अंत तक कहीं जगह मिल जाय। पहले तीन-बार सौ मिलेंगे। समझ में नहीं आताकैसे काम चलेगा। डेढ़ सौ रुपये तो पापा मेरे कालेज का खर्च देते थे। अगर दस-पाँच महीने जगह न मिली तो यह क्या करें गेयह फिक्र और भी खाये डालती है। मुश्किल यही है कि विनोद मुझसे परदा रखते हैं। अगर हम दोनों बैठकर परामर्श कर लेतेतो सारी गुत्थियाँ सुलझ् जातीं। मगर शायद यह मुझे इस योग्य ही नहीं समझते। शायद इनका खयाल है कि मैं केवल रेशमी गुड़िया हूँजिसे भाँति-भाँति के आभूषणोंसुगंधों और रेशमी वस्त्रों से सजाना ही काफी है। थिरेटर में कोई नया तमाशा होने वाला होता हैदौड़े हुए आकर मुझे खबर देते हैं। कहीं कोई जलसा होकोई खेल होकहीं सैर करना हो उसकी शुभ सूचना मुझे अविलम्ब दी जाती है और बड़ी प्रसन्नता के साथमानो मैं रात-दिन विनोद और क्रीड़ा और विलास में मग्न रहना चाहती हूँमानो मेरे हृदय में गंभीर अंश है ही नहीं। यह मेरा अपमान हैघोर अपमानजिसे मैं अब नहीं सह सकती। मैं अपने संपूर्ण अधिकार लेकर ही संतुष्ट हो सकती हूँ। बसइस वक्त इतना ही। बाकी फिर। अपने यहाँ का हाल-हवाल विस्तार से लिखना। मुझे अपने लिए जितनी चिंता हैउससे कम तुम्हारे लिए नहीं है। देखोहम दोनों के डोंगे कहाँ लगते हैं। तुम अपनी स्वदेशीपाँच हजार वर्षों की पुरानी जर्जर नौका पर बैठी होमैं नयेद्रुतगामी मोटर-बोट पर। अवसरविज्ञान और उद्योग। मेरे साथ हैं। लेकिन कोई दैवी विपत्ति आ जायतब भी इसी मोटर-बोट पर डूबूँगी। साल में लाखों आदमी रेल के टक्करों से मर जाते हैंपर कोई बैलगाडियों पर यात्रा नहीं करता। रेलों का विस्तार बढ़ता ही जाता है। बस।

तुम्हारी,

पद्मा

6

गोरखपुर

25-9-25

 

प्यारी पद्मा,

कल तुम्हारा खत मिलाआज जवाब लिख रही हूँ। एक तुम हो कि महीनों रटाती हो। इस विषय में तुम्हें मुझसे उपदेश लेना चाहिए। विनोद बाबू पर तुम व्यर्थ ही आक्षेप लगा रही हो। तुमने क्यों पहले ही उनकी आर्थिक दशा की जाँच-पड़ताल नहीं की बसएक सुन्दररसिकशिष्टवाणी-मधुर युवक देखा और फूल उठीं अब भी तुम्हारा ही दोष है। तुम अपने व्यवहार सेरहन-सहन से सिद्ध कर दो कि तुममें गंभीर अंश भी हैंफिर देखूँ कि विनोद बाबू कैसे तुमसे परदा रखते हैं। और बहनयह तो मानवी स्वभाव है। सभी चाहते हैं कि लोग हमें संपन्न समझें। इस स्वाँग को अंत तक निभाने की चेष्टा की जाती है और जो इस काम में सफल हो जाता हैउसी का जीवन सफल समझा जाता है। जिस युग में धन ही सर्वप्रधान होमर्यादाकीर्तियश—यहाँ तक कि विद्या भी धन से खरीदी जा सकेउस युग में स्वाँग भरना एक लाजिमी बात हो जाती है। अधिकार योग्यता का मुँह ताकते हैं ! यही समझ लो कि इन दोनों में फूल और फल का संबंध है। योग्यता का फूल लगा और अधिकार का फल आया।

इन ज्ञानोपदेश के बाद अब तुम्हें हार्दिक धन्यवाद देती हूँ। तुमने पतिदेव के नाम जो पत्र लिखा थाउसका बहुत अच्छा असर हुआ। उसके पाँचवें ही दिन स्वामी का कृपापात्र मुझे मिला। बहनवह खत पाकर मुझे कितनी खुशी हुईइसका तुम अनुमान कर सकती हो। मालूम होता थाअंधे को आँखें मिल गयी हैं। कभी कोठे पर जाती थीकभी नीचे आती थी। सारे में खलबली पड़ गयी। तुम्हें वह पत्र अत्यन्त निराशाजनक जान पड़तामेरे लिए वह संजीवन-मंत्र थाआशादीपक था। प्राणेश ने बारातियों की उद्दंडता पर खेद प्रकट किया थापर बड़ों के सामने वह जबान कैसे खोल सकते थे। फिर जनातियों ने भीबारातियों का जैसा आदर-सत्कार करना चाहिए थावैसा नहीं किया। अन्त में लिखा था—‘प्रियेतुम्हारे दर्शनों की कितनी उत्कंठा हैलिख नहीं सकता। तुम्हारी कल्पित मूर्ति नित आँखों के सामने रहती है। पर कुल-मर्यादा का पालन करना मेरा  कर्त्तव्य है। जब तक माता-पिता का रुख न पाऊँआ नहीं सकता। तुम्हारे वियोग में चाहे प्राण ही निकल जायँपर पिता की इच्छा की उपेक्षा नहीं कर सकता। हाँएक बात का दृढ़-निश्चय कर चुका हूँ—चाहे इधर की दुनियां उधर हो जायकपूत कहलाऊँपिता के कोप का भागी बनूँघर छोड़ना पड़े पर अपनी दूसरी शादी न करूँगा। मगर जहाँ तक मैं समझता हूँमामला इतना तूल न खींचेगा। यह लोग थोड़े दिनों में नर्म पड़ जायँगे और तब मैं आऊँगा और अपनी हृदयेश्वरी को आँखों पर बिठाकर लाऊँगा।

बसअब मै। संतुष्ट हूँ बहनमुझे और कुछ न चाहिए। स्वामी मुझ पर इतनी कृपा रखते हैंइससे अधिक और वह क्या कर सकते हैं ! प्रियतम! तुम्हारी चन्दा सदस तुम्हारी रहेगीतुम्हारी इच्छा ही उसका कर्त्तव्य है। वह जब तक जिएगीतुम्हारे पवित्र चरणों से लगी रहेगी। उसे बिसारना मत।

बहनआँखों में आँसू भर आते हैंअब नहीं लिखा जाताजवाब जल्द देना।

तुम्हारी,

चन्दा

7

 

दिल्ली

15-12-25

 

प्यारी बहन,

तुझसे बार-बार क्षमा मॉँगती हूँपैरों पड़ती हूँ। मेरे पत्र न लिखने का कारण आलस्य न थासैर-सपाटे की धुन न थी। रोज सोचती थी कि आज लिखूँगीपर कोई-न-कोई ऐसा काम आ पड़ता थाकोई ऐसी बात हो जाती थीकोई ऐसी बाधा आ खड़ी होती थी कि चित्त अशांत हो जाता था और मुँह लपेट कर पड़ रहती थी। तुम मुझे अब देखो तोशायद  पहिचान न सको। मंसूरी से दिल्ली आये एक महीना हो गया। यहाँ विनोद को तीन सौ रुपये की एक जगह मिल गयी है। यह सारा महीना बाजार की खाक छानने में कटा। विनोद ने मुझे  पूरी स्वाधीनता दे रखी है। मैं जो चाहूँकरूँउनसे कोई मतलब नहीं। वह मेरे मेहमान हैं। गृहस्थी का सारा बोझ मुझ पर डालकर वह निश्चिंत हो गए हैं।  ऐसा बेफिक्रा मैंने आदमी ही नहीं देखा। हाजिरी की परवाह हैन डिनर कीबुलाया तो आ गएनहीं तो बैठे हैं। नौकरों से कुछ बोलने की तो मानो इन्होंने कसम ही खा ली है। उन्हें डाटूँ तो मैंरखूँ तो मैंनिकालूँ तो मैंउनसे कोई मतलब ही नहीं। मैं चाहती हूँवह मेरे प्रबन्ध की आलोचना करेंऐब निकालेंमैं चाहती हूँ जब मैं बाजार से कोई चीज लाऊँतो वह बतावें मैं जट गई या जीत आईमैं चहती हूँ महीने के खर्च का बजट बनाते समय मेरे और उनके बीच में खूब बहस होपर इन अरमानों में से एक भी पूरा नहीं होता। मैं नहीं समझतीइस तरह कोई स्त्री कहाँ तक गृह-प्रबन्ध में सफल हो सकती है। विनोद के इस सम्पूर्ण आत्म-समर्पण ने मेरी निज की जरूरतों के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रखी। अपने शौक की चीजें खुद खरीदकर लाते बुरा मालूम होता हैकम-से-कम मुझसे नहीं हो सकमा। मैं जानती हूँमैं अपने लिए कोई चीज लाऊँतो वह नाराज न होंगे। नहींमुझे विश्वास हैखुश होंगेलेकिन मेरा जी चाहता हैमेरे शौक सिंगार की चीजें वह खुद ला कर दें। उनसे लेने में जो आनन्द हैवह खुद जाकर लाने में नहीं। पिताजी अब भी मुझे सौ रुपया महीना देते हैं और उन रुपयों को मैं अपनी जरूरतों पर खर्च कर सकती हूँ। पर न जाने क्यों मुझे भय होता है कि कहीं विनोदद समझेंमैं उनके रुपये खर्च किये डालती हूँ। जो आदमी किसी बात पर नाराज नहीं हो सकतावह किसी बात पर खुश भी नहीं हो सकता। मेरी समझ में ही नहीं आतावह किस बात से खुश और किस बात से नाराज होते हैं। बसमेरी दशा उस आदमी की-सी हैजो  बिना रास्ता जाने इधर-उधर भटकता फिरे। तुम्हें याद होगाहम दोनों कोई गणित का प्रश्न लगाने के बाद कितनी उत्सुकता से उसका जवाब देखती थीजब हमारा जवाब किताब के जवाब से मिल जाता थातो  हमें कितना हार्दिक आनन्द मिलता था। मेहनत सफल हुईंइसका विश्वास हो जाता था। जिन गणित की पुस्तकों में प्रश्नों के उत्तर न लिखे होते थेउसके प्रश्न हल करने की हमारी इच्छा ही न होती थी। सोचते थेमेहनत अकारथ जायगी। मैं रोज प्रश्न हल करती हूँपर नहीं जानती कि जवाब ठीक निकलाया गलत। सोचोमेरे चित्त की क्या दशा होगी।

एक हफ्ता होता हैलखनऊ की मिस रिग से भेंट हो गई। वह लेडी डाक्टर हैं और मेरे घर बहुत आती-जाती हैं। किसी का सिर भी धमका और मिस रिग बुलायी गयीं। पापा जब मेडिकल कालेज में प्रोफेसर थेतो उन्होंने इन मिस रिग को पढ़ाया था। उसका एहसान वह अब भी मानती हैं। यहाँ उन्हें देखकर भोजन का निमंत्रण न देना  अशिष्टता की हद होती। मिस रिग ने दावत मंजूर कर ली। उस दिन मुझे जितनी कठिनाई हुईवह बयान नहीं कर सकती। मैंने कभी अँगरेजों के साथ टेबुल पर नहीं खाया। उनमें भोजन के क्या शिष्टाचार हैंइसका मुझे बिलकुल ज्ञान नहीं। मैंने समझा थाविनोद  मुझे सारी बातें बता देंगे। वह बरसों अँगरेजों के साथ इंग्लैंड रह चुके हैं। मैंने उन्हें मिस रिग के आने की सूचना भी दे दी। पर उस भले आदमी ने मानो सुना ही नहीं। मैंने भी निश्चय कियामैं तुमसे कुछ न पूछूँगीयही न होगा कि मिस रिग हँसेंगी। बला से। अपने ऊपर बार-बार झुँझलाती थी कि कहाँ मिस रिग को बुला बैठी। पड़ोस के बँगलों में कई हमी-जैसे परिवार रहते हैं। उनसे सलाह ले सकती थी। पर यही संकोच होता था कि ये लोग मुझे गँवारिन समझेंगे। अपनी इस विवशता पर थोड़ी देर तक आँसू भी बहाती रही। आखिर निराश होकर अपनी बुद्धि से काम लिया। दूसरे दिन मिस रिग आयीं। हम दोनों भी मेज पर बैठे। दावत शुरू हुई। मैं देखती थी कि विनोद बार-बार झेंपते थे और मिस रिग बार-बार नाक सिकोड़ती थींजिससे प्रकट हो रहा था कि शिष्टाचार की मर्यादा भंग हो रही है। मैं शर्म के मारे मरी जाती थी। किसी भाँति विपत्ति सिर सके टली। तब मैंने कान पकड़े कि अब किसी अँगरेज की दावत न करूँगी। उस दिन से देख रही हूँविनोद मुझसे कुछ खिंचे हुए हैं। मैं भी नहीं बोल रही हूँ। वह शायद समझते हैं कि मैंने उनकी भद्द करा दी। मैं समझ रही हूँ। कि उन्होंने मुझे लज्जित लज्जित किया। सच कहती हूँचन्दागृहस्थी के इन झंझटों में मुझे अब किसी से हँसने बोलने का अवसर नहीं मिलता। इधर महीनों से कोई नयी पुस्तक नहीं पढ़ सकी। विनोद की विनोदशीलता भी न जाने कहाँ चली गयी। अब वह सिनेमा या थिएटर का नाम भी नहीं लेते। हाँमैं चलूँ तो वह तैयार हो जायेंगे। मैं चाहती हूँप्रस्ताव उनकी ओर से होमैं उसका अनुमोदन करूँ। शायद वह पहिले की आदतें छोड़ रहे हैं। मैं तपस्या का संकल्प उनके मुख पर अंकित पाती हूँ। ऐसा जान पड़ता हैअपने में गृह-संचालन की शक्ति न पाकर उन्होंने सारा भार मुझ पर डाल दिया है। मंसूरी में वह घर के संचालक थे। दो-ढाई महीने में पन्द्रह सौ खर्च किये। कहाँ से लायेयह में अब तक नहीं जानती। पास तो शायद ही कुछ रहा हो। संभव है किसी मित्र से ले लिया हो। तीन सौ रुपये महीने की आमदनी में थिएटर और सिनेमा का जिक्र ही क्या ! पचास रुपये तो मकान ही के निकल जाते हैं। मैं इस जंजाल से तंग आ गयी हूँ। जी चाहता हैविनोद से कह दूँ कि मेरे चलाये यह ठेला न चलेगा। आप तो दो-ढाई घंटा यूनिवर्सिटी में काम करके दिन-भर चैन करेंखूब टेनिस खेलेंखूब उपन्यास पढ़ेंखूब सोयें और मैं सुबह से आधी रात तक घर के झंझटों में मरा करूँ। कई बार छेड़ने का इरादा कियादिल में ठानकर उनके पास गयी भीलेकिन उनका सामीप्य मेरे सारे संयमसारी ग्लानिसारी विरक्ति को हर लेता है। उनका विकसित मुखमंडलउनके अनुरक्त नेत्रउनके कोमल शब्द मुझ पर मोहिनी मंत्र-सा डाल देते हैं। उनके एक आलिंगन में मेरी सारी वेदना विलीन हो जाती है। बहुत अच्छा होताअगर यह इतने रूपवान्इतने मधुरभाषीइतने सौम्य न होते। तब कदाचित् मैं इनसे झगड़ बैठतीअपनी कठिनाइयाँ कह सकती। इस दशा में तो इन्होंने मुझे जैसे भेड़ बना लिया है। मगर माया को तोड़ने का मौका तलाश कर रही हूँ। एक तरह से मैं अपना आत्म-सम्मान खो बैठी हूँ। मैं क्यों हर एक बात में किसी की अप्रसन्नता से डरती रहती हूँ मुझमें क्यों यह भाव नहीं आता कि जो कुछ मैं कर रही हूँवह ठीक है। मैं इतनी मुखापेक्षा क्यों करती हूँ इस मनोवृत्ति पर मुझे विजय पाना हैचाहे जो कुछ हो। अब इस वक्त विदा होती हूँ। अपने यहाँ के समाचार लिखनाजी लगा है।

तुम्हारी,

पद्मा

8

 

काशी

25-12-25

 

 

प्यारी पद्मा,

तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे कुछ दु:ख हुआकुछ हँसी आयीकुछ क्रोध आया। तुम क्या चाहती होयह तुम्हें खुद नहीं मालूम। तुमने आदर्श पति पाया हैव्यर्थ की शंकाओं से मन को अशांत न करो। तुम स्वाधीनता चाहती थींवह तुम्हें मिल गयी। दो आदमियों के लिए तीन सौ रुपये कम नहीं होते। उस पर अभी तुम्हारे पापा भी सौ रुपये दिये जाते हैं। अब और क्या करना चाहिएमुझे भय होता है कि तुम्हारा चित्त कुछ अव्यवस्थित हो गया है। मेरे पास तुम्हारे लिए सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं।

मैं पन्द्रह तारीख को काशी आ गयी। स्वामी स्वयं मुझे विदा कराने गये थे। घर से चलते समय बहुत रोई। पहले मैं समझती थी कि लड़कियाँ झूठ-मूठ रोया करती हैं। फिर मेरे लिए तो माता-पिता का वियोग कोई नई बात न थी। गर्मीदशहरा और बड़े दिन की छुट्टियों के बाद छ: सालों से इस वियोग का अनुभव कर रही हूँ। कभी आँखों में आँसू न आते थे। सहेलियों से मिलने की खुशी होती थी। पर अबकी तो ऐसा जान पड़ता था कि कोई हृदय को खींचे लेता है। अम्माँजी के गले लिपटकर तो मैं इतना रोई कि मुझे मूर्छा आ गयी। पिताजी के पैरों पर लोट कर रोने की  अभिलाषा मन में ही रह गयी। हायवह रुदन का आनन्द ! उस समय पिता के चरणों पर गिरकर रोने के लिए मैं अपने प्राण तक दे देती। यही रोना आता था कि मैंने इनके लिए कुछ न किया। मेरा पालन-पोषण करने में इन्होंने क्या कुछ कष्ट न उठाया ! मैं जन्म की रोगिणी हूँ। रोज ही बीमार रहती थी। अम्माँजी रात-रात भर मुझे गोद में लिये बैठी रह जाती थी। पिताजी के कन्धों पर चढ़कर उचकने की याद मुझे अभी तक आती है। उन्होंने कभी मुझे कड़ी निगाह से नहीं देखा। मेरे सिर में दर्द हुआ और उनके हाथों के तोते उड़ जाते थे। दस वर्ष की उम्र तक तो यों गए। छ: साल देहरादून में गुजरे। अबजब इस योग्य हुई कि उनकी कुछ सेवा करूँतो यों पर झाड़कर अलग हो गई। कुल आठ महीने तक उनके चरणों की सेवा कर सकी और यही आठ महीने मेरे जीवन की निधि है। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि मेरा जन्म फिर इसी गोद में हो और फिर इसी अतुल पितृस्नेह का आनन्द भोगूँ।

सन्ध्या समय गाड़ी स्टेशन से चली। मैं जनाना कमरे में थी और लोग दूसरे कमरे में थे। उस वक्त सहसा मुझे स्वामीजी को देखने की प्रबल इच्छा हुई। सान्त्वनासहानुभूति और आश्रय के लिए हृदय व्याकुल हो रहा था। ऐसा जान पड़ता था जैसे कोई कैदी कालापानी जा रहा हो।

घंटे भर के बाद गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी। मैं पीछे की ओर खिड़की से सिर निकालकर देखने लगी। उसी वक्त द्वार खुला और किसी ने कमरे में कदम रखा। उस कमरे में एक औरत भी न थी। मैंने चौंककर पीछे देखा तो एक पुरुष। मैंने तुरन्त मुँह छिपा लिया और बोलीआप कौन हैं यह जनाना कमरा है। मरदाने कमरे में जाइए।

पुरुष ने खड़े-खड़े कहा—मैं तो इसी कमरे में बैठूँगा। मरदाने कमरे में भीड़ बहुत है।

मैंने रोष से कहा—नहींआप इसमें नहीं बैठ सकते।

मैं तो बैठूँगा।’

आपको निकलना पड़ेगा। आप अभी चले जाइयेनहीं तो मैं अभी जंजीर खींच लूँगी।’

अरे साहबमैं भी आदमी हूँकोई जानवर नहीं हूँ। इतनी जगह पड़ी हुई है। आपका इसमें हरज क्या है?’

गाड़ी ने सीटी दी। मैं और घबराकर बोली—आप निकलते हैंया मैं जंजीर खींचूँ ?

पुरुष ने मुस्कराकर कहा—आप तो बड़ी गुस्सावर मालूम होती हैं। एक गरीब आदमी पर आपको जरा भी दया नहीं आती ?

गाड़ी चल पड़ी। मारे क्रोध और लज्जा के मुझे पसीना आ गया। मैंने फौरन द्वार खोल दिया और बोली—अच्छी बात हैआप बैठिएमैं ही जाती हूँ।

बहनमैं सच कहती हूँमुझे उस वक्त लेशमात्र भी भय न था। जानती थीगिरते ही मर जाऊँगीपर एक अजनबी के साथ अकेले बैठने से मर जाना अच्छा था। मैंने एक पैर लटकाया ही था कि उस पुरुष ने मेरी बाँह पकड़ ली और अन्दर खींचता हुआ बोला—अब तक तो आपने मुझे कालेपानी भेजने का सामान कर दिया था। यहाँ और कोई तो है नहींफिर आप इतना क्यों घबराती हैं। बैठिएजरा हँसिए-बोलिए। अगले स्टेशन पर मैं उतर जाऊँगाइतनी देर तक कृपा-कटाक्ष से वंचित न कीजिए। आपको देखकर दिल काबू से बाहर हुआ जाता है। क्यों एक गरीब का खून सिर पर लीजिएगा।.......

मैंने झटककर अपना हाथ छुटा लिया। सारी देह काँपने लगी। आँखों में आँसू भर आये। उस वक्त अगर मेरे पास कोई छुरी या कटार होतीतो मैंने जरूर उसे निकाल लिया होता और मरने-मारने को तैयार हो गई होती। मगर इस दशा में क्रोध से ओंठ चबाने के सिवा और क्या करती ! आखिर झल्लाना व्यर्थ समझकर मैंने सावधान होने की चेष्टा करके कहा—आप कौन हैं उसने उसी ढिठाई से कहा—तुम्हारे प्रेम का इच्छुक।

आप तो मजाक करते हैं। सच बतलाइए।’

सच बता रहा हूँतुम्हारा आशिक हूँ।’

अगर आप मेरे आशिक हैंतो कम-से-कम इतनी बात मानिए कि अगले स्टेशन पर उतर जाइए। मुझे बदनाम करके आप कुछ न पायेंगे। मुझ पर इतनी दया कीजिए।’

मैंने हाथ जोड़कर यह बात कही। मेरा गला भी भर आया था। उस आदमी ने द्वार की ओर जाकर कहा—अगर आपका यही हुक्म हैतो लीजिएजाता हूँ। याद रखिएगा।

उसने द्वार खोल लिया और एक पाँव आगे बढ़ाया। मुझे मालूम हुआ वह नीचे कूदने जा रहा है। बहननहीं कह सकती कि उस वक्त मेरे दिल की क्या दशा हुई। मैंने बिजली की तरह लपककर उसका हाथ पकड़ लिया और अपनी तरफ जोर से खींच लिया।

उसने ग्लानि से भरे हुए स्वर में कहा—‘क्यों खींच लियामैं तो चला जा रहा था।’

अगला स्टेशन आने दीजिए।’

 

 

पेज 3

दो सखियाँ

जब आप भगा ही रही हैंतो जितनी जल्द भाग जाऊँ उतना ही अच्छा।’

मैं यह कब कहती हूँ कि आप चलती गाड़ी से कूद पड़िए।’

अगर मुझ पर इतनी दया हैतो एक बार जरा दर्शन ही दे दो।’

अगर आपकी स्त्री से कोई दूसरा पुरुष बातें करतातो आपको कैसा लगता?’

पुरुष ने त्योरियाँ चढ़ाकर कहा—‘मैं उसका खून पी जाता।’

मैंने निस्संकोच होकर कहा—तो फिर आपके साथ मेरे पति क्या व्यवहार करेंगेयह भी आप समझते होंगे ?

तुम अपनी रक्षा आप ही कर सकती हो। प्रिये! तुम्हें पति की मदद की जरूरत ही नहीं। अब आओमेरे गले से लग जाओ। मैं ही तुम्हारा भाग्यशाली स्वामी और सेवक हूँ।’

मेरा हृदय उछल पड़ा। एक बार मुँह से निकला—अरे! आप!!’ और मैं दूर हटकर खड़ी हो गयी। एक हाथ लंबा घूँघट खींच लिया। मुँह से एक शब्द न निकला।

स्वामी ने कहा—अब यह शर्म और परदा कैसा?

मैंने कहा—आप बड़े छलिये हैं ! इतनी देर तक मुझे रुलाने में क्या मजा आया?

स्वामी—इतनी देर में मैंने तुम्हें जितना पहचान लियाउतना घर के अन्दर शायद बरसों में भी न पहचान सकता। यह अपराध क्षमा करो। क्या तुम सचमुच गाड़ी से कूद पड़तीं ?

अवश्य?’

बड़ी खैरियत हुईमगर यह दिल्लगी बहुत दिनों याद रहेगी।’ मेरे स्वामी औसत कद केसाँवलेचेचकरूदुबले आदमी हैं। उनसके कहीं रूपवान् पुरुष मैंने देखे हैं: पर मेरा हृदय कितना उल्लसित हो रहा था ! कितनी आनन्दमय सन्तुष्टि का अनुभव कर रही थीमैं बयान नहीं कर सकती।

मैंने पूछा—गाड़ी कब तक पहुँचेगी ?

शाम को पहुँच जायेंगे।’

मैंने देखास्वामी का चेहरा कुछ उदास हो गया है। वह दस मिनट  तक चुपचाप बैठे बाहर की तरफ ताकते रहे। मैंने उन्हें केवल बात में लगाने ही के लिए यह अनावश्यक प्रश्न पूछा था। पर अब भी जब वह न बोले तो मैंने फिर न छेड़ा। पानदान खोलकर पान बनाने लगी। सहसाउन्होंने कहा—चन्दाएक बात कहूँ ?

मैंने कहा—हाँ-हाँशौक से कहिए।

उन्होंने सिर झुकाकर शर्माते हुए कहा—मैं जानता कि तुम इतनी रूपवती होतो मैं तुमसे विवाह न करता। अब तुम्हें देखकर मुझे मालूम हो रहा है कि मैंने तुम्हारे साथ अन्याय किया है। मैं किसी तरह तुम्हारे योग्य न था।

मैंने पान का बीड़ा उन्हें देते हुए कहा—ऐसी बातें न कीजिए। आप जैसे हैंमेरे सर्वस्व हैं। मैं आपकी दासी बनकर अपने भाग्य को धन्य मानती हूँ।

दूसरा स्टेशन आ गया। गाड़ी रुकी। स्वामी चले गये। जब-जब गाड़ी रुकती थीवह आकर दो-चार बातें कर जाते थे। शाम को हम लोग बनारस पहुँच गए। मकान एक गली में है और मेरे घर से बहुत छोटा है। इन कई दिनों में यह भी मालूम हो रहा है कि सासजी स्वभाव की रूखी हैं। लेकिन अभी किसी के बारे में कुछ नहीं कह सकती। सम्भव हैमुझे भ्रम हो रहा हो। फिर लिखूँगी। मुझे इसकी चिन्ता नहीं कि घर कैसा हैआर्थिक दशा कैसी हैसास-ससुर कैसे हैं। मेरी इच्छा है कि यहाँ सभी मुझ से खुश रहें। पतिदेव को मुझसे प्रेम हैयह मेरे लिए काफी है। मुझे और किसी बात की परवा नहीं। तुम्हारे बहनोईजी का मेरे पास बार-बार आना सासजी को अच्छा नहीं लगता। वह समझती हैंकहीं यह सिर न चढ़ जाय। क्यों मुझ पर उनकी यह अकृपा हैकह नहीं सकतीपर इतना जानती हूँ कि वह अगर इस बात से नाराज होती हैंतो हमारे ही भले के लिए। वह ऐसी कोई बात क्यों

करेंगीजिसमें हमारा हित न हो। अपनी सन्तान का अहित कोई माता नहीं कर सकती। मुझ ही में कोई बुराई उन्हें नजर आई होगी। दो-चार दिन में आप ही मालूम हो जाएगा ! अपने यहाँ के समाचार लिखना। जवाब की आशा एक महीने के पहले तो है नहींयों तुम्हारी खुशी।

तुम्हारी,

चन्दा

9

 

दिल्ली

1-2-26

 

प्यारी बहन,

तुम्हारे प्रथम मिलन की कुतूहलमय कथा पढ़करचित्त प्रसन्न हो गया। मुझे तुम्हारे ऊपर हसद हो रहा है। मेंने समझा थातुम्हें मुझ पर हसद होगापर क्रिया उलटी हो गयीतुम्हें चारों ओर हरियाली ही नजर आती हैमैं जिधर नजर डालती हूँसूखे रेत और नग्न टीलों के सिवा और कुछ नहीं। खैर ! अब कुछ मेरा वृत्तान्त सुनो—

अब जिगर थामकर बैठोमेरी बारी आयी।”

विनोद की अविचलित दर्शनिकता अब असह्य हो गयी है। कुछ विचित्र जीव हैंघर में आग लगेपत्थर पड़े इनकी बला से। इन्हें मुझ पर जरा भी दया नहीं आती। मैं सुबह से शाम तक घर के झंझटों में कुढ़ा करूँइन्हें कुछ परवाह नहीं। ऐसा सहानुभूति से खाली आदमी कभी नहीं देखा था। इन्हें तो किसी जंगल में तपस्या करनी चाहिए थी। अभी तो खैर दो ही प्राणी हैंलेकिन कहीं बाल-बच्चे हो गये तब तो मैं बे-मौत मर जाऊँगी। ईश्वर न करेवह दारुण विपत्ति मेरे सिर पड़े।

चन्दामुझे अब दिल से लगी हुई है कि किसी भाँति इनकी वह समाधि भंग कर दूँ। मगर कोई उपाय सफल नहीं होताकोई चाल ठीक नहीं पड़ती। एक दिन मैंने उनके कमरे के लंप का बल्व तोड़ दिया। कमरा अँधेरा पड़ा रहा। आप सैर करके आयेतो कमरा अँधेरा देखा। मुझसे पूछामैंने कह दिया बल्ब टूट गया। बसआपने भोजन किया और मेरे कमरे में आकर लेट रहे। पत्रों और उपन्यासों की ओर देखा तक नहींन-जाने वह उत्सुकता कहाँ विलीन हो गयी। दिन-भर गुजर गयाआपको बल्व लगवाने की कोई फिक्र नहीं। आखिरमुझी को बाजार से लाना पड़ा।

एक दिन मैंने झुँझलाकर रसोइये को निकाल दिया। सोचा जब लाला रात-भर भूखे सोयेंगेतब आँखें खुलेंगी। मगर इस भले आदमी ने कुछ पूछा तक नहीं। चाय न मिलीकुछ परवाह नहीं। ठीक दस बजे आपने कपड़े पहनेएक बार रसोई की ओर जाकर देखासन्नाटा था। बसकालेज चल दिये। एक आदमी पूछता हैमहाराज कहाँ गयाक्यों गयाअब क्या इन्तजाम होगाकौन खाना पकायेगाकम-से-कम इतना तो मुझसे कह सकते थे कि तुम अगर नहीं पका सकतीतो बाजार ही से कुछ खाना मँगवा लो। जब वह चले गएतो मुझे बड़ा पश्चात्ताप हुआ। रायल होटल से खाना मँगवाया और बैरे के हाथ कालेज भेज दिया। पर खुद भूखी ही रही। दिन-भर भूख के मारे बुरा हाल था। सिर में दर्द होने लगा। आप कालेज से आए और मुझे पड़े देखा तो ऐसे परेशान हुए मानो मुझे त्रिदोष है। उसी वक्त एक डाक्टर बुला भेजा। डाक्टर आयेआँखें देखीजबान देखीहरारत देखीलगाने की दवा अलग दीपीने की अलगआदमी दवा लेने गया। लौटा तो बारह रुपये का बिल भी था। मुझे इन सारी बातों पर ऐसा क्रोध आ रहा था कि कहाँ भागकर चली जाऊँ। उस पर आप आराम-कुर्सी डालकर मेरी चारपाई के पास बैठ गए और एक-एक पल पर पूछने लगे कैसा जी है ?  दर्द कुछ कम हुआ यहाँ मारे भूख के आँतें कुलकुला रही थी। दवा हाथ से छुई तक नहीं। आखिर झख मारकर मैंने फिर बैरे से खाना मंगवाया। फिर चाल उलटी पड़ी। मैं डरी कि कहीं सबेरे फिर यह महाशय डाक्टर को न बुला बैठैंइसलिए सबेरा होते ही हारकर फिर घर के काम-धन्धे में लगी। उसी वक्त एक दूसरा महाराज बुलवाया। अपने पुराने महाराज को बेकसूर निकालकर दण्डस्वरूप एक काठ के उल्लू को रखना पड़ाजो मामूली चपातियाँ भी नहीं पका सकता। उस दिन से एक नयी बला गले पड़ी। दोनों वक्त दो घंटे इस महाराज को सिखाने में लग जाते हैं। इसे अपनी पाक-कला का ऐसा घमण्ड है कि मैं चाहे जितना बकूँपर करता अपने ही मन की है। उस पर बीच-बीच में मुस्कराने लगता हैमानो कहता हो कि ‘तुम इन बातों को क्या जानोचुपचाप बैठी देख्ती जाव।’ जलाने चली थी विनोद को और खुद जल गयी। रुपये खर्च हुएवह तो हुए हीएक और जंजाल में फँस गयी। मैं खुद जानती हूँ कि विनोद का डाक्टर को बुलाना या मेरे पास बैठे रहना केवल दिखावा था। उनके चेहरे पर जरा भी घबराहट न थीचित्त जरा भी अशांत न था।

चंदामुझे क्षमा करना। मैं नहीं जानती कि ऐसे पुरुष के पाले पड़कर तुम्हारी क्या दशा होतीपर मेरे लिए इस दशा में रहना असह्य है। मैं आगे जो वृत्तान्त कहने वाली हूँउसे सुनकर तुम नाक-भौं सिकोड़ोगीमुझे कोसोगीकलंकिनी कहोगीपर जो चाहे कहोमुझे परवा नहीं। आज चार दिन होते हैंमैंने त्रिया-चरित्र का एक नया अभिनय किया। हम दोनों सिनेमा देखने गये थे। वहाँ मेरी बगल में एक बंगाली बाबू बैठे हुए थे। विनोद सिनेमा में इस तरह बैठते हैंमानो ध्यानावस्था में हों। न बोलनान चालना! फिल्म इतनी सुन्दर थीऐक्टिंग इतनी सजीव कि मेरे मुँह से बार-बार प्रशंसा के शब्द निकल जाते थे। बंगाली बाबू को भी बड़ा आनन्द आ रहा था। हम दोनों उस फिल्म पर आलोचनाएँ करने लगे। वह फिल्म के भावों की इतनी रोचक व्याख्या करता था कि मन मुग्ध हो जाता था। फिल्म से ज्यादा मजा मुझे उसकी बातों में आ रहा था। बहनसच कहती  हूँशक्ल-सूरत में वह विनोद के तलुओं की बराबरी भी नहीं कर सकतापर केवल विनोद को जलाने के लिए मैं उससे मुस्करा-मुस्करा कर बातें करने लगी। उसने समझाकोई शिकार फँस गया। अवकाश के समय वह बाहर जाने लगातो मैं भी उठ खड़ी हुईपर विनोद अपनी जगह पर ही बैठे रहे।

मैंने कहा—बाहर चलते होमेरी तो बैठे-बैठे कमर दुख गयी।

विनोद बोले—हाँ-हाँ चलोइधर-उधर टहल आयें। मैंने लापरवाही से कहा—तुम्हारा जी न चाहे तो मत चलोमैं मजबूर नहीं करती।

विनोद फिर अपनी जगह पर बैठते हुए बोले—अच्छी बात है।

मैं बाहर आयी तो बंगाली बाबू ने पूछा—क्या आप यहीं की रहने वाली हैं ? ‘मेरे पति यहाँ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं।’

अच्छा! वह आपके पति थे। अजीब आदमी हैं।’

आपको तो मैंने शायद यहाँ पहले ही देखा है।’

हाँमेरा मकान तो बंगाल में है। कंचनपुर के महाराज साहब का प्राइवेट सेक्रेटरी हूँ। महाराजा साहब वाइसराय से मिलने आये हैं। ’

तो अभी दो-चार दिन रहिएगा?’

जी हाँआशा तो करता हूँ। रहूँ तो साल-भर रह जाऊँ। जाऊँ तो दूसरी गाड़ी से चला जाऊँ। हमारे महाराजा साहब का कुछ ठीक नहीं। यों बड़े सज्जन और मिलनसार हैं। आपसे मिलकर बहुत खुश होंगे।

यह बातें करते-करते हम रेस्ट्राँ में पहुँच गये। बाबू ने चाय और टोस्ट लिया। मैंने सिर्फ चाय ली।

तो  इसी वक्त आपका महाराजा साहब से परिचय करा दूं। आपको आश्चर्य होगा कि मुकुटधारियों में भी इतनी नम्रता और विनय हो सकती है। उनकी बातें सुनकर आप मुग्ध हो जायँगी।’

मैंने आईने में अपनी सूरत देखकर कहा—जी नहींफिर किसी दिन पर रखिए। आपसे तो अक्सर मुलाकात होती रहेगी। क्या आपकी स्त्री आपके साथ नहीं आयीं ?

युवक ने मुस्कराकर कहा—मैं अभी क्वाँरा हूँ और शायद क्वाँरा ही रहूँ?

मैंने उत्सुक होकर पूछा—अच्छा! तो आप भी स्त्रियों से भागने वाले जीवों में हैं। इतनी बातें तो हो गयी और आपका नाम तक न पूछा।

बाबू ने अपना नाम भुवनमोहन दास गुप्त बताया। मैंने अपना परिचय दिया।

जी नहींमैं उन अभागों में हूँजो एक बार निराश होकर फिर उसकी परीक्षा नहीं करते। रूप की तो संसार में कमी नहींमगर रूप और गुण का मेल बहुत कम देखने में आता है। जिस रमणी से मेरा प्रेम थावह आज एक बड़े वकील की पत्नी है। मैं गरीब था। इसकी सजा मुझे ऐसी मिली कि जीवनपर्यन्त न भूलेगी। साल-भर तक जिसकी उपासना कीजब उसने मुझे धन पर बलिदान कर दियातो अब और क्या आशा रखूँ?

मैंने हँसकर कहा—‘आपने बहुत जल्द हिम्मत हार दी।’

भुवन ने सामने द्वार की ओर ताकते हुए कहा—मैंने आज तक ऐसा वीर ही नहीं देखाजो रमणियों से परास्त न हुआ हो। ये हृदय पर चोट करती हैं और हृदय एक ही गहरी चोट सह सकता है। जिस रमणी ने मेरे प्रेम को तुच्छ समझकर पैरों से कुचल दियाउसको मैं दिखाना चाहता हूँ कि मेरी आँखों में धन कितनी तुच्छ वस्तु हैयही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। मेरा जीवन उसी दिन सफल होगाजब विमला के घर के सामने मेरा विशाल भवन होगा और उसका पति मुझसे मिलने में अपना सौभाग्य समझेगा।

मैंने गम्भीरता से कहा—यह तो कोई बहुत ऊँचा उद्देश्य नहीं है। आप यह क्यों समझते हैं कि विमला ने केवल धन के लिए आपका परित्याग किया। सम्भव हैइसके और भी कारण हों। माता-पिता ने उस पर दबाव डाला होया अपने ही में उसे कोई ऐसी त्रुटि दिखलाई दी होजिससे आपका जीवन दु:खमय हो जाता। आप यह क्यों समझते हैं कि जिस प्रेम से वंचित होकर आप इतने दु:खी हुएउसी प्रेम से वंचित होकर वह सुखी हुई होगी। सम्भव थाकोई धनी स्त्री पाकर आप भी फिसल जाते।

भुवन ने जोर देकर कहा—यह असम्भव हैसर्वथा असम्भव है। मैं उसके लिए त्रिलोक का राज्य भी त्याग देता।

मैंने हँसकर कहा—हाँइस वक्त आप ऐसा कह सकते हैंमगर ऐसी परीक्षा में पड़कर आपकी क्या दशा होतीइसे आप निश्चयपूर्वक नहीं बता सकते। सिपाही की बहादुरी का प्रमाण उसकी तलवार हैउसकी जबान नहीं। इसे अपना सौभाग्य समझिए कि आपको उस परीक्षा में नहीं पड़ना पड़ा। वह प्रेमप्रेम नहीं हैजो प्रत्याघात की शरण ले। प्रेम का आदि भी सहृदयता है और अन्त भी सहृदयता। सम्भव हैआपको अब भी कोई ऐसी बात मालूम हो जायजो विमला की तरफ से आपको नर्म कर दे।

भुवन गहरे विचार में डूब गया। एक मिनट के बाद उन्होंने सिर उठाया। और बोले—‘मिसेज विनोदआपने आज एक ऐसी बात सुझा दीजो आज तक मेरे ध्यान में आयी ही न थी। यह भाव कभी मेरे मन में उदय ही नहीं हुआ। मैं इतना अनुदार क्यों हो गयासमझ में नहीं आता। मुझे आज मालूम हुआ कि प्रेम के ऊँचे आदर्श का पालन रमणियाँ ही कर सकती हैं। पुरुष कभी प्रेम के लिए आत्म-समर्पण नहीं कर सकता — वह प्रेम को स्वार्थ और वासना से पृथक नहीं कर सकता। अब मेरा जीवन सुखमय हो जायगा। आपने मुझे आज शिक्षा दी हैउसके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ।’

यह कहते-कहते भुवन सहसा चौंक पड़े और बोले—ओह! मैं कितना बड़ा मूर्ख हूँ—सारा रहस्य समझ में आ गयाअब कोई बात छिपी नहीं है। ओहमैंने विमला के साथ घोर अन्याय किया! महान्  अन्याय! मैं बिल्कुल अंधा हो गया था। विमलामुझे क्षमा करो।

भुवन इसी तरह देर तक विलाप करते रहे। बार-बार मुझे धन्यवाद देते थे और मूर्खता पर पछताते थे। हमें इसकी सुध ही न रही कि कब घंटी बजीकब खेल शुरू हुआ। यकायक विनोद कमरे में आए। मैं चौंक पड़ी। मैंने उनके मुख की ओर देखाकिसी भाव का पता न था। बोले—तुम अभी यही होपद्मा! खेल शुरू हुए तो देर हुई! मैं चारों तरफ तुम्हें खोज रहा था।

मैं हकबकाकर उठ खड़ी हुई और बोली—खेल शुरू हो गयाघंटी की आवाज तो सुनायी ही नहीं दी।

भुवन भी उठे। हम फिर आकर तमाशा देखने लगे। विनोद ने मुझे अगर इस वक्त दो-चार लगने वाली बातें कह दी होतींउनकी आँखों में क्रोध की झलक दिखायी देतीतो मेरा अशान्त हृदय सँभल जातामेरे मन को ढाढ़स होतीपर उनके अविचलित विश्वास ने मुझे और भी अशांत कर दिया। बहनमैं चाहती हूँवह मुझ पर शासन करें। मैं उनकी कठोरताउनकी उद्दण्डताउनकी बलिष्ठता का रूप देखना चाहती हूँ। उनके प्रेमप्रमोदविश्वास का रूप देख चुकी। इससे मेरी आत्मा को तृप्ति नहीं होती ! तुम उस पिता को क्यों कहोगीजो अपने पुत्र को अच्छा खिलायेअच्छा पहनायेपर उसकी शिक्षा-दीक्षा की कुछ चिनता न करेवह जिस राह जायउस राह जाने देजो कुछ करेवह करने दे। कभी उसे कड़ी आँख से देखे भी नहीं। ऐसा लड़का अवश्य ही आवारा हो जायगा। मेरा भी वही हाल हुआ जाता है। यह उदासीनता मेरे लिए असह्य है। इस भले आदमी ने यहाँ तक न पूछा कि भुवन कौन है भुवन ने यही तो समझा होगा कि इसका पति इसकी बिल्कुल परवाह नहीं करता। विनोद खुद स्वाधीन रहना चाहते हैंमुझे भी स्वाधीन छोड़ देना चाहते हैं। वह मेरे किसी काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते। इसी तरह चाहते हैं कि मैं भी उनके किसी काम में हस्तक्षेप न करूँ  मैं इस स्वाधीनता को दोनों ही के लिए विष तुल्य समझती हूँ। संसार में स्वाधीनता का चाहे जो भी मूल्य होघर में तो पराधीनता ही फलती-फूलती है। मैं जिस तरह अपने एक जेवर को अपना समझती हूँउसी तरह विनोद को अपना समझना चाती हूँ। अगर मुझसे पूछे बिना विनोद उसे किसी को दे देंतो मैं लड़ पड़ूँगी। मैं चाहती हूँकहाँ हूँक्या पढ़ती हूँकिस तरह जीवन जीवन व्यतीत करती हूँइन सारी बातों पर उनकी तीव्र दृष्टि रहनी चाहिए। जब वह मेरी परवाह नहीं करतेतो मैं उनकी परवाह क्यों करूँइस खींचातानी में हम एक-दूसरे से अलग होते चले जा रहे हैं और क्या कहूँमुझे कुछ नहीं मालूम कि वह किन मित्रों को रोज पत्रा लिखते हैं। उन्होंने भी मुझसे  कभी कुछ नहीं पूछा। खैरमैं क्या लिख रही थीक्या कहने लगी। विनोद ने मुझसे कुछ नहीं पूदा। मैं फिर भुवन से फिल्म के सम्बन्ध में बातें करने लगी।

जब खेल खत्म हो गया और हम लोग बाहर आए और ताँगा ठीक करने लगेतो भुवन ने कहा—‘मैं अपनी कार में आपको पहुँचा दूँगा।’

हमने कोई आपत्ति नहीं की। हमारे मकान का पता पूछकर भुवन ने कार चला दी। रास्ते में मैंने भुवन से कहा—‘कल मेरे यहाँ दोपहर का खाना खाइएगा।’ भुवन ने स्वीकार कर लिया।

भुवन तो हमें पहुँचाकर चले गएपर मेरा मन बड़ी देर तक उन्हीं की तरफ लगा रहा। इन दो-तीन घंटों में भुवन को जितना समझीउतना विनोद को आज तक नहीं समझी। मैंने भी अपने हृदय की जितनी बातें उससे कह दींउतनी विनोद से आज तक नहीं कहीं। भुवन उन मनुष्यों में हैजो किसी पर पुरुष को मेरी कुदृष्टि डालते देखकर उसे मार डालेगा। उसी तरह मुझे किसी पुरुष से हँसते देखकर मेरा खून पी लेगा और जरूरत पड़ेगीतो मेरे लिए आग में कूद पड़ेगा। ऐसा ही पुरुष-चरित्र मेरे हृदय पर विजय पर सकता है।मेरे ही हृदय पर नहींनारी-जाति (मेरे विचार में) ऐसे ही पुरुष पर जान देती हैं। वह निर्बल हैइसलिए बलवान् का आश्रय ढूँढ़ती है।

बहन,  तुम ऊब गई होगीखत बहुत लम्बा हो गयामगर इस काण्ड को समाप्त किए बिना नहीं रहा जाता। मैंने सबेरे ही से भुवन की दावत की तैयारी शुरू कर दी। रसोइया तो काठ का उल्लू हैमैंने सारा काम अपने हाथ से किया। भोजन बनाने में ऐसा आनन्द मुझे और कभी न मिला था।

भुवन बाबू की कार ठीक समय पर आ पहुँची। भुवन उतरे और सीधे मेरे कमरे में आए। दो-चार बातें हुईं। डिनर-टेबल पर जा बैठे। विनोद भी भोजन करने आए। मैंने उन दोनों आदमियों का परिचय करा दिया। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि विनोद ने भुवन की ओर से कुछ उदासीनता दिखायी। इन्हें राजाओं-रईसों से चिढ़ हैसाम्यवादी हैं। जब राजाओं से चिढ़ है तो उनके पिट्ठुओं से क्यों न होती। वह समझते हैंइन रईसों के दरबार में खुशामदीनिकम्मेसिद्धान्तहीनचरित्रहीन लोगों का जमघट रहता हैजिनका इसके सिवाय और कोई काम नहीं कि अपने रईस की हर एक उचित-अनुचित इच्छा पूरी करें और प्रजा का गला काटकर अपना घर भरें। भोजन के समय बातचीत की धारा घूमते-घूमते विवाह और प्रेम-जैसे महत्त्व के विषय पर आ पहुँची।

 

विनोद ने कहा—‘नहींमैं वर्तमान वैवाहिक प्रथा को पसन्द नहीं करता। इस प्रथा का आविष्कार उस समय हुआ थाजब मनुष्य सभ्यता की प्रारम्भिक दशा में था। तब से दुनियां बहुत आगे बढ़ी है। मगर विवाह प्रथा

 

 

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दो सखियाँ

में जौ-भर भी अन्तर नहीं पड़ा। यह प्रथा वर्तमान काल के लिए इपयोगी नहीं।’

भुवन ने कहा—‘आखिर आपको इसमें क्या दोष दिखाई देते हैं ?

विनोद ने विचारकर कहा—‘इसमें सबसे बड़ा ऐब यह है कि यह एक सामाजिक प्रश्न को धार्मिक रूप दे देता है।’

और दूसरा?’

दूसरा यह कि यह व्यक्तियों की स्वाधीनता में बाधक हैं। यह स्त्रीव्रत और पतिव्रत का स्वाँग रचकर हमारी आत्मा को संकुचित कर देता है। हमारी बुद्धि के विकास में जितनी रुकावट इस प्रथा ने डाली हैउतनी और किसी भौतिक या दैविक क्रांति से भी नहीं हुई। इसने मिथ्या आदर्शों को हमारे सामने रख दिया और आज तक हम उन्हीं पुरानीसड़ी हुईलज्जाजनक पाशविक लकीरों को पीटते जाते हैं। व्रत केवल एक निरर्थक बंधन का नाम है। इतना महत्त्वपूर्ण नाम देकर हमने उस कैद को धार्मिक रूप दे दिया है। पुरुष क्यों  चाहता है कि स्त्री उसको अपना ईश्वरअपना सर्वस्व समझे केवल इसलिए कि वह उसका भरण-पोषण करता है। क्या स्त्री का कर्त्तव्य केवल पुरुष की सम्पत्ति के लिए वारिस पैदा करना हैउस सम्पत्ति के लिए जिस परहिन्दू नीतिशास्त्र के अनुसारपति के देहान्त के बाद उसका कोई अधिकार नहीं रहता। समाज की यह सारी व्यवस्थासारा संगठन सम्पत्ति-रक्षा के आधार पर हुआ है। इसने सम्पत्ति को प्रधान और व्यक्ति को गौण कर दिया है। हमारे ही वीर्य से उत्पन्न सन्तान हमारी कमाई हुई जायदाद का भोग करेइस मनोभाव में कितनी स्वार्थान्धताकितना दासत्व छिपा हुआ है,  इसका कोई अनुमान नहीं कर सकता। इस कैद में जकड़ी हुई समाज की सन्तान यदि आज घर मेंदेश मेंसंसार मेंअपने क्रूर स्वार्थ के लिए रक्त की नदियाँ बहा रही हैतो क्या आश्चर्य है। मैं इस वैवाहिक प्रथा को सारी बुराइयों का मूल समझता हूँ।

भुवन चकित  हो गया। मैं खुद चकित हो गई। विनोद ने इस विषय पर मुझसे कभी इतनी स्पष्टता से बातचीत न की थी। मैं यह तो जानती थीवह साम्यवादी हैंदो-एक बार इस विषय पर उनसे बहस भी कर  चुकी हूँ पर वैवाहिक प्रथा के वे इतने विरोधी हैंयह मुझे मालूम न था। भुवन के चेहरे से ऐसा प्रकट होता था कि उन्होंने ऐसे दार्शनिक विचारों की गंध तक नहीं पाई। जरा देर के बाद बोले—प्रोफेसर साहेबआपने तो मुझे एक बड़े चक्कर में डाल दिया। आखिर आप इस प्रथा की जगह कोई और प्रथा रखना चाहते हैं या विवाह की आवश्यकता ही नहीं समझते जिस तरह पशु-पक्षी आपस में मिलते हैंवह हमें भी करना चाहिए?

विनोद ने तुरंत उत्तर दिया—बहुत कुछ। पशु-पखियों में सभी का मानसिक विकास एक-सा नहीं है। कुछ ऐसे हैंजो  जोड़े के चुनाव में कोई विचार नहीं रखते। कुछ ऐसे हैंजो एक बार बच्चे पैदा करने के बाद अलग हो जाते हैंऔर कुछ ऐसे हैंजो जीवनपर्यन्त एक साथ रहते हैं। कितनी ही भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। मैं मनुष्य होने के नाते उसी श्रेणी को श्रेष्ठ समझता हूँजो  जीवनपर्यन्त एक साथ रहते हैं। मगर स्वेच्छा से। उनके यहाँ कोई कैद नहींकोई सजा नहीं। दोनों अपने-अपने चारे-दाने की फिक्र करते हैं। दोनों मिलकर रहने का स्थान बनाते हैंदोनों साथ बच्चों का पालन करते हैं। उनके बीच में कोई तीसरा नर या मादा आ ही नहीं सकतायहाँ तक कि उनमें से जब एक मर जाता है तो दूसरा मरते दम तक फुट्टैल रहता है। यह अन्धेर मनुष्य-जाति ही में है कि स्त्री ने किसी दूसरे पुरुष से हँसकर बात की और उसके पुरुष की छाती पर साँप लोटने लगाखून-खराबे के मंसूबे सोचे जाने लगे। पुरुष ने किसी दूसरी स्त्री की ओर रसिक नेत्रों से देखा और अर्धांगिनी ने त्योरियाँ बदलींपति के प्राण लेने को तैयार हो गई। यह सब क्या है ऐसा मनुष्य-समाज सभ्यता का किस मुँह से दावा कर सकता है ?

भुवन ने सिर सहसलाते हुए कहा—मगर मनुष्यों में भी तो भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। कुछ लोग हर महीने एक नया जोड़ा खोज निकालेंगे।

विनोद ने हँसकर कहा—लेकिन यह इतना आसान काम न होगा। या तो वह ऐसी स्त्री चाहेगाजो सन्तान का पालन स्वयं कर सकती हो या उसे एक मुश्त सारी रकम अदा करना पड़ेगी !

भुवन भी हँसे—आप अपने को किस श्रेणी में रक्खेंगे?

विनोद इस प्रश्न के लिए तैयार न थ। था भी बेढंगा-सा सवाल। झेंपते हुए बोले—परिस्थितियाँ जिस श्रेणी में ले जायँ। मैं स्त्री और पुरुष दोनों के लिए पूर्ण स्वाधीनता का हामी हूँ। कोई कारण नहीं है कि मेरा मन किसी नवयौवना की ओर आकर्षित हो और वह भी मुझे चाहे तो भी मैं समाज और नीति के भय से उसकी ओर ताक न सकूँ। मैं इसे पाप नहीं समझता।

भुवन अभी कुछ उत्तर न देने पाये थे कि विनोद उठ खड़े हुए। कालेज के लिए देर हो रही थी। तुरन्त कपड़े पहने और चल दिये। हम दोनों  दीवानखाने में आकर बैठे और बातें करने लगे।

भुवन ने सिगार जलाते हुए कहा—‘कुछ सुना’ कहाँ जाकर तान टूटी?

मैंने मारे शर्म के सिर झुका लिया। क्या जवाब देती। विनोद की  अन्तिम बात ने मेरे हृदय पर कठोर आघात किया था। मुझे ऐसा मालूम हो रहा था कि विनोद ने केवल मुझे सुनाने के लिए विवाह का यह नया खण्डन तैयार किया है। वह मुझसे पिंड छुड़ा लेना चाहते हैं। वह किसी रमणी की ताक में हैंमुझसे उनका जी भर गया। वह ख्याल करके मुझे बड़ा दु:ख हुआ। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। कदाचित् एकांत में मैं न रोतीपर भुवन के सामने मैं संयत न रह सकी। भुवन ने मुझे बहुत सांत्वना दी—‘आप व्यर्थ इतना शोक करती हैं। मिस्टर विनोद आपका मान न करेंपर संसार में कम-से-कम एक ऐसा व्यक्ति हैजो आपके संकेत पर अपने प्राण तक न्योछावर कर सकता। आप-जैसी रमणी-रत्न पाकर संसार में ऐसा कौन पुरुष हैजो अपने भाग्य को धन्य न मानेगा। आप इसकी बिलकुल चिन्ता न करें।’

मुझे भुवन की यह बात बुरी मालूम हुई। क्रोध से मेरा मुख लाल हो गया। यह धूर्त मेरी इस दुर्बलता से लाभ उठाकर मेरा सर्वनाश करना चाहता है। अपने दुर्भाग्य पर बराबर रोना आता था। अभी विवाह हुए साल भी नहीं पूरा हुआमेरी यह दशा हो गई कि दूसरों को मुझे बहकाने और मुझ पर अपना जादू चलाने का साहस हो रहा है। जिस वक्त मैंने विनोद को देखा  थामेरा हृदय कितना फूल उठा था। मैंने अपने हृदय को कितनी भक्ति से उनके चरणों पर अर्पण किया था। मगर क्या जानती थी कि इतनी जल्द मैं उनकी आँखों से गिर जाऊँगी और मुझे परित्यक्ता समझफिर शोहदे मुझ पर डोरे डालेंगे।

मैंने आँसू पोंछते हुए कहा—मैं आपसे क्षमा माँगती हूँ। मुझे जरा विश्राम लेने दीजिए।

हाँ-हाँआराम करेंमैं बैठा देखता रहूँगा।’

जी नहींअब आप कृपा करके जाइए। यों मुझे आराम न मिलेगा।’

अच्छी बात हैआप आराम  कीजिए। मैं सन्ध्या-समय आकर देख जाऊँगा।’

जी नहींआपको कष्ट करने की कोई जरूरत नहीं है।’

अच्छा तो मैं कल जाऊँगा। शायद महाराजा साहब भी आवें।’

नहींआप लोग मेरे बुलाने का इन्तजार कीजिएगा। बिना बुलाये न आइएगा।’

यह कहती हुई मैं उठकर अपने सोने के कमरे की ओर चली। भुवन एक क्षण मेरी ओर देखता रहाफिर चुपके से चला गया।

बहनइसे दो दिन हो गये हैं। पर मैं कमरे से बाहर नहीं निकली। भुवन दो-तीन बार आ चुका हैमगर मैंने उससे मिलने से साफ इनकार कर दिया। अब शायद उसे फिर आने का साहस न होगा। ईश्वर ने बड़े नाजुक मौके पर मुझे सुबुद्धि प्रदान कीनहीं तो मैं अब तक अपना सर्वनाश कर बैठी होती। विनोद प्राय: मेरे पास ही बैठे रहते हैं। लेकिन उनसे बोलने को मेरा जी नहीं चाहता। जो पुरुष व्यभिचार का दाशर्निक सिद्धांतों से समथर्न कर सकता हैजिसकी आँखों में विवाह-जैसे पवित्र बन्धन को कोई मूल्य नहींजो न मेरा हो सकता हैन मुझे अपना बना सकता हैउसके साथ मुझ-जैसी मानिनी गर्विणी स्त्री का कै दिन निर्वा  होगा!

बसअब विदा होती हूँ। बहनक्षमा करना। मैंने तुम्हारा बहुत-सा अमूल्य समय ले लिया। मगर इतना समझ लो कि मैं तुम्हारी दया नहींसहानुभूति चाहती हूँ।

तुम्हारी,

पद्मा

10

 

काशी

5-1-26

 

बहन,

तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे ऐसा मालूम हुआ कि कोई उपन्यास पढ़कर उठी हूं। अगर तुम उपन्यास लिखोंतो मुझें विश्वास हैउसकी धूम मच जाय। तुम आप उसकी नायिका बन जाना। तुम ऐसी-ऐसी बातें कहॉँ सीख गयीमुझें तो यही आश्चर्य है। उस बंगाली के साथ तुम अकेली कैसी बैठी बातें करती रहींमेरी तो समझ नहीं आता। मैं तो कभी न कर सकती। तुम विनोद को जलाना चाहती होउनके चित्त को अशांत करना चाहती हो। उस गरीब के साथ तुम कितना भयंकर अन्याय कर रही हो ! तुम यह क्यों समझती हो कि विनोद तुम्हारी उपेक्षा कर रहे हैंअपने विचारों में इतने मग्न है कि उनकी रुचि ही नहीं रही। संभव हैवह कोई दार्शनिक तत्व खोज रहें होकोई थीसिस लिख रहीं होकिसी पुस्तक की रचना कर रहे हों। कौन कह सकता है तुम जैसी रुपवती स्त्री पाकर यदि कोई मनुष्य चिन्तित रहेतो समझ लो कि उसके दिल पर कोई बड़ा बोझ हैं। उनको तुम्हारी सहानुभूति की जरुरत हैतुम उनका बोझ हलका कर सकती  हों। लेकिन तुम उलटे उन्हीं को दोष देती हों। मेरी समझ में नही आता कि तुम  एक दिन क्यों विनोद से दिल खोलकर बातें नहीं कर लेतीसंदेह को जितनी जल्द हो सकेंदिल से निकाल डालना चाहिए। संदेह वह चोट हैजिसका उपच जल्द न होतो नासूर पड़ जाता है और फिर अच्छा नहीं होता। क्यों दो-चार दिनों के लिए यहॉँ नहीं चली आतीं तुम शायद कहोतू ही क्यों नहीं चली आती। लेकिन मै स्वतन्त्र नही हूँबिना सास-ससुर से पूछे कोई काम  नहीं कर सकती। तुम्हें तो कोई बंधन नहीं है।

बहनआजकल मेरा जीवन हर्ष और शोक का विचित्र मिश्रण हो रहा हैं। अकेली होती हूँतो रोती हूंआनन्द आ जाते है तो हॅंसती हूँ। जी चाहता हैवह हरदम मेरे सामने बैठे रहते। लेकिन रात के बारह बजे के पहले उनके दर्शन नहीं होते। एक दिन दोपहर को आ गयेंतो सासजी ने ऐसा डॉंटा कि कोई बच्चे को क्या डॉंटेगा। मुझें ऐसा भय हो रहा है कि सासजी को मुझसे चिढ़ हैं। बहनमैं उन्हें भरसक प्रसन्न रखने की चेष्टा करती हूँ। जो काम कभी न किये थेवह उनके लिए करती हूँउनके स्नान के लिए पानी गर्म करती हूँउनकी पूजा के लिए चौकी बिछाती हूँ। वह स्नान कर लेती हैंतो उनकी धोती छॉँटती हूँवह लेटती हैं तो उनके पैर दबाती हूँजब वह सो जाती है तो उन्हें पंखा झलती हूँ। वह मेरी माता हैंउन्ही के गर्भ से वह रत्न उत्पन्न हुआ है जो मेरा प्राणधार है। मै उनकी कुछ सेवा कर सकूँइससे बढकर मेरे लिए सौभाग्य की और क्या बात होगी। मैं केवल इतना ही चाहती हूँ कि वह मुझसे हँसकर बोलेमगर न जाने क्यों वह बात-बात पर मुझे कोसने दिया करती हैं। मैं जानती हूँदोष मेरा ही हैं। हॉँमुझे मालूम नहींवह क्या हैं। अगर मेरा यही अपराध है कि मैं अपनी दोनों नन्दों से रुपवती क्यों हूँपढ़ी-लिखी क्यों हूँआन्नद मुझें इतना क्यों चाहते हैंतो बहनयह मेरे बस की बात नही। मेरे प्रति सासजी को भ्रम होता होगा कि मैं ही आन्नद को भरमा रहीं हूँ। शायद वह पछताती है कि क्यों मुझें बहू बनाया ! उन्हे भय होता है कि कहीं मैं उनके बैटे को उनसे छीन न लूँ। दो-एक बार मुझे जादूगरनी कही चुकी हैं। दोनों ननदें अकारण ही मुझसे जलती रहती है। बड़ी ननदजी तो अभी कलोर हैंउनका जलना मेरी समझ में नही आता। मैं उनकी जगह होती,तो अपनी भावज से कुछ सीखने कीकुछ पढ़ने की कोशिश करतीउनके चरण धो-धोकर पीतीपर इस छोकरी को मेरा अपमान करने ही में आन्नद आता हैं। मैं जानती हूँथोड़े दिनों में दोनों ननदें लज्जित होंगी। हॉँअभी वे मुझसे बिचकती हैं। मैं अपनी तरफ से तो उन्हें अप्रसन्न होने को कोई अवसर नहीं देती।

मगर रुप को क्या करुँ। क्या जानती थी कि एक दिन इस रुप के कारण मैं अपराधिनी ठहरायी जाऊँगी। मैं सच कहती हूँ बहनयहाँ मैने सिगांर करना एक तरह से छोड़ ही दिया हैं। मैली-कुचैली बनी बेठी रहती  हूँ। इस भय से कि कोई मेरे पढ़ने-लिखने पर नाक न सिकोड़ेपुस्तकों को हाथ नहीं लगाती। घर से पुस्तकों का एक गटठर बॉँध लायी थी। उसमें कोई पुस्तकें बड़ी सुन्दर हैं। उन्हें पढ़ने के लिए बार-बार जी चाहता हैंमगर छरती हूँ कि कोई ताना न दे बैठे। दोनों ननदें मुझें देखती रहती हैं कि यह क्या करती  हैंकैसे बैठती हैकैसे बोलती हैमानो दो-दो जासूस मेरे पीछे लगा दिए गए हों। इन दोनों महिलाओं को मेरी बदगोई में क्यों इतना मजा आता हैंनही कह सकती। शायद आजकल उन्हे सिवा दूसरा काम ही नहीं। गुस्सा तो ऐसा आता हैं कि एक बार झिढ़क दूँलेकिन मन को समझाकर रोक लेती हूँ। यह दशा बहुत दिनों नहीं रहेगी। एक नए आदमी से कुछ हिचक होना स्वाभाविक ही हैविशेषकर जब वह नया आदमी शिक्षा और विचार व्यवहार में हमसे अलग हो। मुझी को अगर किसी फ्रेंच लेडी के साथ रहना पड़ेतो शायद मे भी उसकी हरएक बात को आलोचना और कुतूहल की दृष्टि से देखने लगूँ। यह काशीवासी लोग पूजा-पाठ बहुत करते है। सासजी तो रोज गंगा-स्नान करने जाती हैं। बड़ी ननद भी उनके साथ जाती है। मैने कभी पूजा नहीं की। याद हैहम और तुम पूजा करने वालों को कितना बनाया करती थी। अगर मै पूजा करने वालों का चरित्र  कुछ उन्नत पातीतो शायद अब तक मै भी पूजा करती होती। लेकिन मुझे तो कभी ऐसा अनुभव प्राप्त नहीं हुआपूजा करने वालियॉँ भी उसी तरह दूसरों की निन्दा करती हैंउसी तरह आपस में लड़ती-झगड़ती हैंजैसे वे जो कभी पूजा नहीं करतीं। खैरअब मुझे धीरे-धीरे पूजा से श्रद्धा होती जा रही हैं। मेरे ददिया ससुरजी ने एक छोटा-सा ठाकुरद्वारा बनवा दिया था। वह मेरे घर के सामने ही हैं। मैं अक्सर सासजी के साथ वहॉँ जाती हूँ और अब यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि उन विशाल मूर्तियों के दर्शन से मुझे अपने अतस्तल में एक ज्योति का अनुभव होता है। जितनी अश्रद्धा से मैं राम और कृष्ण के जीवन की आलोचना किया करती थीवह बहुत कुछ मिट चुकी हैं।

लेकिन रुपवती होने का दण्ड यहीं तक बस नहीं है। ननदें अगर मेरे रुप कों देखकर जलती हैंतो यह स्वाभाविक हैं। दु:खी तो इस बात का है कि यह दण्ड मुझे उस तरफ से भी मिल रहा हैजिधर से इसकी कोई संभावना न होनी चाहिए—मेरे आनन्द बाबू  भी मुझे इसका दण्ड दे रहे है। हॉँउनकी दण्डनीति एक निराले ही ढग की हैं। वह मेरे पास नित्य ही कोई-न-कोई सौगात लाते रहते है। वह जितनी देर मेरे पास रहते है। उनके मन में यह संदेह होता रहता है कि मुझे उनका रहना अच्छा नहीं लगता। वह समझते है कि मैं उनसे जो प्रेम करती हूँयह केवल दिखावा हैकोशल है।। वह मेरे सामने कुछ ऐसे दबे-दबायेंसिमटे-सिमटायें रहते है कि मैं मारे लज्जा के मर जाती हूँ। उन्हें मुझसे कुछ कहते हुए ऐसा संकोच होता हैमानो वह कोई अनाधिकार चेष्टा कर रहे हों। जैसे मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए कोई आदमी उज्जवल वस्त्र पहनने वालों से दूर ही रहना चाहता हैवही दशा इनकी है। वह शायद समझते हैं कि किसी रुपवती स्त्री को रूपहीन पुरुष से प्रेम हो ही नहीं सकता। शायद वह दिल में पछतातें है कि क्यों इससे विवाह किया। शायद उन्हें अपने ऊपर ग्लानि होती है। वह मुझे कभी रोते देख लेते हैतो समझते है। मैं अपने भाग्य को रों रही हूँकोई पत्र लिखते देखते हैंतो समझते हैमैं उनकी रुपहीनता ही का रोना रो रही हूँ। क्या कहूँ बहनयह सौन्दर्य मेरी जान का गाहक हो गया। आनन्द के मन से शंका को निकालने और उन्हें अपनी ओर से आश्वासन देने के लिए मुझे ऐसी-ऐसी बातें करनी पड़ती हैंऐसे-ऐसे आचरण करने पड़ते हैंजिन पर मुझे घृणा होती हैं। अगर पहले से यह दशा जानतीतो ब्रह्मा से कहती कि मुझे कुरूपा ही बनाना। बड़े असमंजस में पड़ी हूँ! अगर सासजी की सेवा नहीं करतीबड़ी ननदजी का मन नहीं रखतीतो उनकी ऑंखों से गिरती हूँ। अगर आनन्द बाबू को निराश करती हूँतो कदाचित् मुझसे विरक्त ही हो जायँ। मै तुमसे अपने हृदय की बात कहती हूँ। बहनतुमसे क्या पर्दा रखना हैमुझे आनन्द बाबू  से उतना प्रेम हैजो किसी स्त्री को पुरूष से हो सकता हैउनकी जगह अब अगर इन्द्र भी सामने आ जायँतो मै उनकी ओर ऑख उठाकर न देखूँ। मगर उन्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ। मै देखती हूँवह किसी न किसी बहाने से बार-बार घर मे आते है और दबी हुईललचाई हुई नजरों से मेरे कमरे के द्वार की ओर देखते हैतो जी चाहता हैजाकर उनका हाथ पकड़ लूँ और अपने कमरे में खींच ले आऊँ। मगर एक तो डर होता है कि किसी की ऑंख पड़ गयीतो छाती पीटने लगेगीऔर इससे भी बड़ा डर यह कि कहीं आनन्द इसे भी कौशल ही न समझ बैठे। अभी उनकी आमदनी बहुम कम हैलेकिन दो-चार रुपये सौगातों मे रोज उड़ाते हैं। अगर प्रेमोपहार-स्वरूप वह धेले की कोई चीज देंतो मैं उसे ऑंखों से लगाऊँलेकिन वह कर-स्वरूप देते हैंमानो उन्हें ईश्वर ने यह दण्ड दिया हैं। क्या करूँअब मुझे भी प्रेम का स्वॉँग करना पड़ेगा। प्रेम-प्रदर्शन से मुझे चिढ़ हैं। तुम्हें याद होगामैने एक बार कहा था कि प्रेम या तो भीतर ही रहेगा या बाहर ही रहेगा। समान रूप से वह भीतर और बाहर दोनों जगह नहीं रह सकता। सवॉँग वेश्याओं के लिए हैकुलवंती तो प्रेम को हृदय ही में संचित रखती हैं!

बहनपत्र बहुत लम्बा हो गयातुम पढ़ते-पढ़ते ऊब गयी होगी। मैं भी लिखते-लिखते थक गयी। अब शेष बातें कल लिखूँगी। परसों यह पत्र तुम्हारे पास पहूँचेगा।

 

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     बहनक्षमा करनाकल पत्र लिखने का अवसर नहीं मिला। रात एक ऐसी बात हो गयीजिससे चित्त अशान्त उठा। बड़ी मुश्किलों से यह थोड़ा-सा समय निकाल सकी हूँ। मैने अभी तक आनन्द से घर के किसी प्राणी की शिकायत नहीं की थी। अगर सासजी ने कोई बात की दी या ननदजी ने कोई ताना दे दियातो इसे उनके कानों तक क्यों पहुँचाऊँ। इसके सिवा कि गृह-कलह उत्पन्न होइससे और क्या हाथ आयेगा। इन्हीं जरा-जरा सी बातों को न पेट में डालने से घर बिगड़ते हैं। आपस में वैमनस्य बढ़ता हैं। मगर संयोग की बातकल अनायास ही मेरे मुंह से एक बात निकल गयी जिसके लिये मै अब भी अपने को कोस रहीं हूँऔर ईश्वर से मनाती हूँ कि वह आगे न बढ़े। बात यह हुई कि कल आन्नद बाबू बहुत देर करके मेरे पास आये। मैं उनके इन्तार में बैठी एक पुस्तक पढ़ रही थी। सहसा सासजी ने आकर पूछा—क्या अभी तक बिजली जल रही हैक्या वह रात-भर न आयेंतो तुम रात-भर बिजली जलाती रहोगी?

मैनें उसी वक्त बत्ती ठण्डी कर दी। आनन्द बाबू थोड़ी ही देर मे आयेंतो कमरा अँधेरा पड़ा था न-जाने उस वक्त मेरी मति कितनी मन्द हो गयी थी। अगर मैने उनकी आहट पाते ही बत्ती जला दी होतीतो कुछ न होतामगर मैं अँधेरे में पड़ी रहीं। उन्होनें पूछा—क्या सो गयींयह अधेरा क्यों पड़ा हुआ है?

हाय! इस वक्त भी यदि मैने कह दिया होता कि मैने अभी बती गुल कर दी तो बात बन जाती। मगर मेरे मुँह से निकला—‘सांसजी का हुक्म हुआ कि बत्ती गुल कर दोगुल कर दी। तुम रात-भर न आओतो क्या रातभर बत्ती जलती रहें?’

तो अब तो जला दो। मै रोशनी के सामने से आ रहा हूँ। मुझे तो कुछ सूझता ही नहीं।’

मैने अब बटन को हाथ से छूने की कसम खा ली है। जब जरूरत पड़गीतो मोम की बत्ती जला लिया करूँगी। कौन मुफ्त में घुडकियॉँ सहें।’

आन्नद ने बिजली का बटन दबाते हुए कहा—‘और मैने कसम खा ली कि रात-भर बत्ती जलेगीचाहे किसी को बुरा लगे या भला। सब कुछ देखता हूँअन्धा नहीं हूँ। दूसरी बहू आकर इतनी सेवा करेगी तो देखूँगातुम नसीब की खोटी हो कि ऐसे प्राणियों के पाले पड़ी। किसी दूसरी सास की तुम इतनी खिदमत करतींतो वह तुम्हें पान की तरह फेरतीतुम्हें हाथों पर लिए रहतीमगर यहॉँ चाहे प्राण ही दे देकिसी के मुँह से सीधी बात न निकलेगी।’

मुझे अपनी भूल साफ मालूम हो गयी। उनका क्रोध शान्त करने के इरादे से बोली—गलती भी तो मेरी ही थी कि व्यर्थ आधी रात तक बत्ती जलायें बैठी रही। अम्मॉँजी ने गुल करने को कहातो क्या बुरा कहा मुझे समझानाअच्छी सीख देनाउनका धर्म हैं। मेरा धर्म यही है कि यथाशक्ति उनकी सेवा करूँ और उनकी शिक्षा को गिरह बाँधूँ।

आन्नद एक क्षण द्वार की ओर ताकते रहे। फिर बोले—मुझे मालूम हो रहा है कि इस घर में मेरा अब गुजर न होगा। तुम नहीं कहतींमगर मै सब कुछ सुनता रहता हूँ। सब समझता हूँ। तुम्हें मेरे पापों का प्रायश्चित करना पड़ रहा हैं। मै कल अम्मॉँजी से साफ-साफ कह दूँगा—‘अगर आपका यही व्यवहार हैतो आप अपना घर लीजिएमै अपने लिए कोई दूसरी राह निकाल लूँगा।’

मैंने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा—नहीं-नहीं। कहीं ऐसा गजब भी न करना। मेरे मुँह में आग लगेकहॉँ से कहाँ बत्ती का जिकर कर बैठी। मैं तुम्हारे चरण छूकर कहती हूँमुझे न सासजी से कोई शिकायत हैन ननदजी सेदोनों मुझसे बड़ी हैमेरी माता के तुल्य हैं। अगर एक बात कड़ी भी कह देंतो मुझे सब्र करना चाहिए! तुम उनसे कुछ न कहना नहीं तो मझे बड़ा दु:ख होगा।

आनन्द ने रुँधे कंठ से कहा—तुम्हारी-जैसी बहू पाकर भी अम्मॉँजी का कलेजा नहीं पसीजताअब क्या कोई स्वर्ग की देवी घर में आतीतुम डरो मतमैं ख्वाहमख्वाह लड़ूँगा नहीं। मगर हॉँइतना अवश्य कह दूँगा कि जरा अपने मिजाज को काबू में रखें। आज अगर मै दो-चार सौ रुपयें घर में लाता होतातो कोई चूँ न करता। कुछ कमाकर नहीं लातायह उसी का दण्ड है। सच पूछोंतो मुझे विवाह करने का कोई अधिकार ही न था। मुझ-जैसे मन्द बुद्धि कोजो कौड़ी कमा नहीं सकताउसे अपने साथ किसी महिला को डुबाने का क्या हक था! बहनजी को न-जाने क्या सूझी है कि तुम्हारे पीछे पड़ी रहती हैं। ससुराल का सफाया कर दियाअब यहॉँ भी आग लगाने पर तुली हुई है। बसपिताजी का लिहाज करता हूँनहीं इन्हें तो एक दिन में ठीक कर देता।

बहनउस वक्त तो मैने किसी तरह उन्ही शान्त कियापर नहीं कह सकती कि कब वह उबल पड़े। मेरे लिए वह सारी दुनियां से लड़ाई मोल ले लेगें। मै जिन परिस्थितयों में हूँउनका तुम अनुमान कर सकती हो। मुझ पर कितनी ही मार पड़े मुझे रोना न चाहिएजबान तक न हिलाना चाहिए। मैं रोयी और घर तबाह हुआ। आनन्द फिर कुछ न सुनेगेकुछ न देखेगें। कदाचित इस उपाय से वह अपने विचार मे मेरे हृदय में अपने प्रेम का अंकुर जमाना चाहते हो। आज मुझे मालूम हुआ कि यह कितने क्रोधी हैं। अगर मैने जरा-सा पुचार दे दिया होतातो रात ही को वह सासजी की खोपड़ी पर जा पहुँचते। कितनी युवतियॉँ इसी अधिकार के गर्व में अपने को भूल जाती हैं। मै तो बहनईश्वर ने चाहा तो कभी न भूलूँगी। मुझे इस बात का डर नहीं है कि आनन्द अलग घर बना लेगेंतो गुजर कैसे होगा। मै उनके साथ सब-कुछ झेल सकती हूँ। लेकिन घर तो तबाह हो जायेगा।

बसप्यारी पद्माआज इतना ही। पत्र का जवाब जल्द देना।

तुम्हारी,

चन्दा

 

 

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दो सखियाँ

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दिल्ली

5-2-26

 

प्यारी चन्दा,

क्या लिखूँ,  मुझ पर तो विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा! हायवह चले गए। मेरे विनोद का तीन दिन से पता नहीं—निर्मोही चला गयामुझे छोड़कर बिना कुछ कहे-सुने चला गया—अभी तक रोयी नहीं। जो लोग पूछने आते हैंउनसे बहाना कर देती हूँ कि—दो-चार दिन में आयेंगेएक काम से काशी गये हैं। मगर जब रोऊँगी तो यह शरीर उन ऑंसुओं में डूब जायेगा। प्राण उसी मे विसर्जित हो जायँगे। छलियें ने मुझसे कुछ भी नहीं कहारोज की तरह उठाभोजन कियाविद्यालय गयानियत समय पर लौटारोज की तरह मुसकराकर मेरे पास आया। हम दोनों ने जलपान कियाफिर वह दैनिक पत्र पढ़ने लगामैं टेनिस खेलने चली गयी। इधर कुछ दिनो से उन्हें टेनिस से कुछ प्रेम न रहा थामैं अकेली ही जाती। लौटीतो रोज ही की तरह उन्हें बरामदे में टहलते और सिगार पीते देखा। मुझे देखते ही वह रोज की तरह मेरा ओवरकोट लाये और मेरे ऊपर डाल दिया। बरामदे से नीचे उतरकर खुले मैदान मे हम टहलने लगे। मगर वह ज्यादा बोले नहींकिसी विचार में डूबे रहें। जब ओस अधिक पड़ने लगीतो हम दोनों फिर अन्दर चले आयें। उसी वक्त वह बंगाली महिला आ गयीजिनसे मैने वीणा सीखना शुरू किया है। विनोद भी मेरे साथ ही बैठे रहे। संगीत उन्हें कितना प्रिय हैयह तुम्हें लिख चुकी हूँ। कोई नयी बात नहीं हुई। महिला के चले जाने के बाद हमने साथ-ही-साथ भोजन यिका फिर मै अपने कमरे में लेटने आयी। वह रोज की तरह अपने कमरे मे लिखने-पढ़ने चले गयें! मैं जल्द ही सो  गयीलेकिन बेखबर पड़ी रहूँउनकी आहट पाते ही आप-ही-आप ऑंखे खुल गयीं। मैने देखावह अपना हरा शाल ओढ़े खड़े थें। मैने उनकी ओर हाथ बढ़ाकर कहा—आओंखड़े क्यों होऔर फिर सो गयी। बसप्यारी बहन! वही विनोद के अंतिम दर्शन थे। कह नहीं सकतीवह पंलग पर लेटे या नहीं। इन ऑखों में न-जाने कौन-सी महानिद्रा समायी हुई थी। प्रात: उठी तो विनोद को न पाया। मैं उनसे पहले उठती हूँवह पड़े सोते रहते हैं। पर आज वह पलंग पर न थें। शाल भी न था। मैने समझाशायद अपने कमरे में चले गये हों। स्नान-गृह में चली गयी। आध घंटें मे बाहर आयीफिर भी वह न दिखायी दिये। उनके कमरे में गयीवहॉँ भी न थें। आश्चर्य हुआ कि इतने सबरे कहॉँ चले गयें। सहसा खूँटी पर पड़ी—कपड़े ने थे। किसी से मिलने चले गयेया स्नान के पहले सैर करने की ठानी। कम-से-कम मुझसे कह तो देतेसंशय मे तो जी न पड़ता। क्रोध आया—मुझे लौंडी समझते हैं…

हाजिरी का समय आया। बैरा मेज पर चाय रख गया। विनोद के इतंजार में चाय ठंडी हो गयी। मै बार-बार झुँझालती थीकभी भीतर जातीकभी बाहर आतीठान ली थी कि आज ज्योही महाशय आयेंगेऐसा लताड़ूँगी कि वह भी याद करेंगे। कह दूँगीआप अपना घर लीजिएआपकों अपना घर मुबारक रहेंमै अपने घर चली जाऊँगी। इस तरह तो रोटियॉँ वहॉं भी मिल जायेंगी। जाड़े के नौ बजने में देर ही क्या लगती है। विनोद का अभी पता नहीं। झल्लायी हुई कमरे मे गयी कि एक पत्र लिखकर मेज पर रख दूँ—साफ-साफ लिख दूँ कि इस तरह अगर रहना हैतो आप  रहिए मे नहीं रह सकती। मै जितना ही तरह देती जाती हूँउतना ही तुम मुझे चिढ़ाते हों। बहनउस क्रोध मे सन्तप्त भावों की नदी-सी मन में उमड़ रही थी। अगर लिखने बैठती,  तो पन्नों-के-पन्ने लिख डालती। लेकिन आह! मै तो भाग जान की धमकी ही दे रही थीवह पहले ही भाग चुके थे। ज्योंही मेज पर बैठीमुझे पैडी मे उनका एक पत्र मिला। मैने तुरन्त उस पत्र को निकाल लिया और सरसरी निगाह से पढ़ा—मेरे हाथ कॉँपने लगेपॉँव थरथराने लगेजान पड़ा कमरा हिल रहा है। एक ठण्डीलम्बीहृदय को चीरने वाली आह खींचकर मैं कोच पर गिर पड़ी। पत्र यह था—

प्रियें ! नौ महीने हुएजब मुझे पहली बार तुम्हारे दर्शनों का सौभाग्य हुआ था। उस वक्त मैने अपने को धन्य माना था। आज तुमसे वियोग का दुर्भाग्य हो रहा है फिर भी मैं अपने को धन्य मानता हूँ। मुझे जाने का लोशमात्र भी दु:ख नहीं हैक्योकि मै जानता हूँ तुम खुश होगी। जब तुम मेरे साथ सुखी नही रह सकतीतो मैं तबरदस्ती क्यों पड़ा रहूँ। इससे तो यह कहीं अच्छा है कि हम और तुम अलग हो जायँ। मै जैसा हूँवैसा ही रहूँगा। तुम भी जैसी होवैसी ही रहोगी। फिर सुखी जीवन की सम्भावना कहाँमै विवाह को आत्म-विकास का पूरी का साधन समझता हूँ। स्त्री पुरुष के सम्बन्ध का अगर कोई अर्थ हैतो यही हैवर्ना मै विवाह की कोई जरुरत नहीं समझता। मानव सन्तान बिना विवाह के भी जीवित रहेगी और शायद इससे अच्छे रूप में। वासना भी बिना विवाह के पूरी हो सकती हैघर के प्रबन्ध के लिए विवाह करने की काई जरुरत नहीं। जीविका एक बहुत ही गौण प्रश्न है। जिसे ईश्वर ने दो हाथ दिये है वह कभी भूखा नहीं रह सकता। विवाह का उद्देश्य यही और केवल यही हैं कि स्त्री और पुरूष एक-दूसरे की आत्मोन्नति में सहायक हों। जहॉँ अनुराग होंवहा विवाह है और अनुराग ही आत्मोन्नति का मुख्य साधन है। जब अनुराग न होतो विवाह भी न रहा। अनुराग के बिना विवाह का अर्थ नहीं।

जिस वक्त मैने तुम्हें पहली बार देखा थातुम मुझे अनुराग की सजीव मूर्ति-सी नजर आयी थीं। तुममे सौंदर्य थाशिक्षा थीप्रेम थास्फूर्ति थीउमंग थी। मैं मुग्ध हो गया। उस वक्त मेरी अन्धी ऑंखों को यह न सूझा कि जहॉँ तुममें इतने गुण थेवहॉँ चंचलता भी थीजो इन सब गुणों पर पर्दा डाल देती। तुम चंचल होगजब की चंचलजो उस वक्त मुझे न सूझा था। तुम ठीक वैसी ही होजैसी तुम्हारी दूसरी बहनें होती हैन कमन ज्यादा। मैने तुमको स्वाधीन बनाना चाहा थाक्योंकि मेरी समझ मे अपनी पूरी ऊँचाई तक पहुँचने के लिए इसी की सबसे अधिक जरूरत है। संसार भर में पुरूषों के विरुद्ध क्यों इतना शोर मचा हुआ हैइसीलिए कि हमने औरतों की आजादी छीन ली है और उन्हें अपनी इच्छाओं की लौंडी बना रखा है। मैने तुम्हें स्वाधीन कर दिया। मै तुम्हारे ऊपर अपना कोई अधिकार नहीं मानता। तुम अपनी स्वामिनी होमुझे कोई चिन्ता न थी। अब मुझे मालूम हो रहा हैतुम स्वेच्छा से नहींसंकोच या भय या बन्धन के कारण रहती हो। दो ही चार दिन पहले मुझ पर यह  बात खुली है। इसीलिए अब मै तुम्हारें सुख के मार्ग में बाधा नहीं डालना चाहता। मै कहीं भागकर नहीं जा रहा हूँ। केवल तुम्हारे रास्ते से हटा जा रहा हूँऔर इतनी दूर हटा जा रहा हूँकि तुम्हें मेरी ओर से पूरी निश्चिन्तता हो जाय। अगर मेरे बगैर तुम्हारा जीवन अधिक सुन्दर हो सकता हैतो तुम्हें जबरन नहीं रखना चाहता। अगर मै समझता कि तुम मेरे सुख के मार्ग बाधक हो रही होंतो मैने तुमसे साफ-साफ कह दिया होता। मै धैर्य और नीति का ढोंग नहीं मानताकेवल आत्माका संतोष चाहता हूँ—अपने लिए भीतुम्हारे लिए भी। जीवन का तत्व यही हैमूल्य यही है। मैने डेस्क में अपने विभाग के अध्यक्ष के नाम एक पत्र लिखकर रख दिया हैं। वह उनके पास भेज देना। रूपये  की कोई चिन्ता मत करना। मेरे एकाउंट मे अभी इतने रूपये हैंजो तुम्हारे लिए  कई महीने को काफी हैंऔर उस वक्त तक मिलते रहेगेंजब तक तुम लेना चाहोगी। मै समझता हूँमैने अपना भाव स्पष्ट कर दिया है। इससे अधिक स्पष्ट मै नहीं करना चाहता। जिस वक्त तुम्हारी इच्छा मुझसे मिलने की होबैंक से मेरा पता पूछ लेना। मगर दो-चार दिन के बाद। घबराने की कोई बात नहीं। मै स्त्री को अबला या अपंग नहीं समझता। वह अपनी रक्षा स्वयं कर सकती हैं—अगर करना चाहें। अगर अब या अब से दो-चार महीनादो-चार साल पीछें तुम्हे मेरी याद आए और तुम समझों कि मेरे साथ सुखी रह सकती हो,  तो मुझे केवल दो शब्द लिखकर डाल देनामै तुरन्त आ जाऊँगाक्योंकि मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं। तुम्हारे साथ मेरे जीवन के  जितने के जितने दिन कटे हैंवह मेरे लिए स्वर्ग-स्वप्न के दिन हैं। जब तक जीउँगीइस जीवन की आनन्द-स्मृतियों कों हृदय में संचित रखूँगा। आह! इतनी देर तक मन को रोके रहने के बाद ऑंखों से एक बूँद ऑंसू गिर ही पड़ा। क्षमा करनामैनें तुम्हें ‘चंचल’ कहा हैं। अचंचल कौन हैजानता हूँ कि तुमने मुझे अपने हृदय से निकालकर फेंक दिया हैंफिर भी इस एक घंटे में कितनी बार तुमको देख-देखकर लौट आया हूँ! मगर इन बातों को लिखकर मैं तुम्हारी दया को उकसाना नहीं चाहता। तुमने वही कियाजिसका मेरी नीति में तुमको अधिकार थाहै और रहेगां। मैं विवाह में आत्मा को सर्वोपरी रखना चाहता हूँ। स्त्री और पुरुष में मै वही प्रेम चाहता हूँजो दो स्वाधीन व्यक्तियों में होता हैं। वह प्रेम नहीं जिसका आधार पराधीनता हैं।

बसअब और कुछ न लिखूँगा। तुमको एक चेतावनी देने की इच्छा हो रही है पर दूँगा नहींक्योंकि तुम अपना भला और बुरा खुद समझ सकती हो। तुमने सलाह देने का हक मुझसे छीन लिया है। फिर भी इतना कहे बगैर नहीं रहा जाता कि संसार में प्रेम का स्वॉँग भरने वाले शोहदों की कमी नहीं हैउनसे बचकर रहना। ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि तुम जहॉं रहोआनन्द से रहों। अगर कभी तुम्हें मेरी जरूरत पड़ेतो याद करना। तुम्हारी एक तस्वीर का अपहरण किये जाता हूँ। क्षमा करनाक्या मेरा इतना अधिकार भी नहींहाय! जी चाहता हैएक बार फिर देख आऊँमगर नहीं आऊँगा।’

तुम्हारा ठुकराया हुआ,

विनोद

     बहनयह पत्र पढ़कर मेरे चित्त की जो दशा हुईउसका तुम अनुमान कर सकती हो। रोयी तो नहींपर दिल बैठा जाता था। बार-बार जी चाहता था कि विष खाकर सो रहूँ। दस बजने में अब थोड़ी ही देर थी। मैं तुरन्त विद्यालय गयी और दर्शन-विभाग के अध्यक्ष को विनोद का पत्र पढ़कर बोले—आपको मालूम हैवह कहॉँ गये और कब तक आयेंगेंइसमें तो केवल एक मास की छुटटी मॉँगी गयी है। मैनें बहाना किया—वह एक आवश्यक  कार्य से काशी गये है। और निराश होकर लौट आयी। मेरी अन्तरात्मा संहस्रों जिहवा बनकर मुझे धिक्कार रही थी। कमरे में उनकी तस्वीर के सामने घुटने टेककर मैने जितने पश्चाताप–पूर्ण शब्दों में क्षमा माँगी हैवह अगर किसी तरह उनके कानों तक पहुँच सकतीतो उन्हें मालूम होता कि उन्हें मेरी ओर से कितना भ्रूम हुआ! तब से अब तक मैनें कुछ भोजन नहीं किया और न एक मिनट सोयी। विनोद मेरी क्षुधा  और निद्रा भी अपने साथ लेते गये और शायद इसी तरह दस-पॉँच दिन उनकी खबर न मिलीतो प्राण भी चले जायेंगें। आज मैं बैंक तर्क गयी थीयह पूछने कि  हिम्मत न पड़ी कि विनोद का कोई पत्र आयां। वह सब क्या सोचते कि यह उनकी पत्नी होकर हमसे पूछने आयी हैं!

बहनअगर विनोद न आयेतो क्या होगामैं समझती थीवह मेरी तरफ से उदासीन हैंमेरी परवा नहीं करतेमुझसे अपने दिल की बातें छिपाते हैंउन्हें शायद मैं भारी हो गयी हूँ। अब मालूम हुआमै कैसे भयंकर-भ्रम में पड़ी हुई थी। उनका मन इतना  कोमल हैयह मैं जानतीतो उस दिन क्यों भुवन को मुँह लगातीमैं उस अभागे का मुँह तक न देखती। इस वक्त जो उसे देख पाऊँतो शायद गोली मार दूँ। जरा तुम विनोद के पत्र को फिर पढोंबहन—आप मुझे स्वाधीन बनाने चले थे। अगर स्वाधीन बनाते थेंतो भुवन से जरा देर मेरा बातचीत कर लेना क्यों इतना अखरामुझें उनकी अविचलित शांति से चिढ़ होती थी। वास्तव में उनके हृदय में इस रात-सी बात ने जितनी अशांति पैदा कर दीशायद मुझमें न कर  सकती। मैं किसी रमणी से उनकी रूचि देखकर शायद मुँह फुला लेतीताने देतीखुद रोतीउन्हें रुलातीपर इतनी जल्द भाग न जाती। मर्दों का घर छोड़कर भागना तो आज तक नहीं सुनाऔरतें ही घर छोड़कर मैके भागती हैया कहीं डूबने जाती हैंया आत्महत्या करती हैं। पुरूष निर्द्वन्द्व बैठे मूंछों पर ताव देते हैं। मगर यहॉँ उल्टी गंगा बह रही हैं—पुरूष ही भाग खड़ा हुआ! इस अशांति की थाह कौन लगा सकता हैंइस प्रेम की गहराई को कौन समझ सकता हैंमै तो अगर इस वक्त विनोद के चरणों पर पड़े-पड़े मर जाऊँ तो समझूँमुझे स्वर्ग मिल गया। बसइसके सिवा मुझे अब और कोई इच्छा नहीं हैं। इस अगाध-प्रेम ने मुझे तृप्त कर दिया। विनोद मुझसे भागे तोलेकिन भाग न सके। वह मेरे हृदय सेमेरी धारणा सेइतने निकट कभी न थे। मैं तो अब भी उन्हें अपने सामने बैठा देख रही हूँ। क्या मेरे सामने फिलासफर बनने चले थेकहॉँ गयी आपकी वह दार्शनिक  गंभीरतायों अपने को धोखा देते होयों अपनी आत्मा को कुचलते हों अबकी तो तुम भागेलेकिन फिर भागना तो देखूँगी। मै न जानती थी कि तुम ऐसे चतुर बहुरूपिये  हो। अब मैने समझाऔर शायद तुम्हारी दार्शनिक गंभीरता को भी समझ मे आया होगा कि प्रेम जितना ही सच्चा जितना ही हार्दिक होता हैउतना ही कोमल होता हें वह वपत्ति के उन्मत्त सागर में थपेड़ खा सकता हैपर अवहेलना  की एक चोट भी नहीं सह सकता। बहिनबात विचित्र हैपर है सच्चीमै इस समय अपने अन्तस्तल में जितनी उमंगजितने आनन्द का अनुभव कर रही हूँयाद नहीं आता कि विनोद के हृदय से लिपटकर भी कभी पाया हो। तब पर्दा बीच में थाअब कोई पर्दा बीच में नहीं रहा। मै उनको प्रचलित प्रेम व्यापार की कसौटी पर कसना चाहती थी। यह फैशन हो गया कि पुरुष घर मे आयेंतो स्त्री के वास्ते कोई तोहफा लायेपुरुष रात-दिन स्त्री के लिए गहने बनवानेकपड़े सिलवानेबेलफीतेलेस खरीदने में मस्त रहेफिर स्त्री को उससे कोई शिकायत नहीं। वह आदर्श-पति हैउसके प्रेम में किसे संदेह हो सकता हैलेकिन उसकी प्रेयसी की मृत्यु के तीसरे महीने वह फिर नया विवाह रचाता है। स्त्री के साथ अपने प्रेम को भी चिता मे जला आता है। फिर वही स्वॉँग इस नयी प्रेयसी से होने लगते हैंफिर वही लीला शुरू हो जाती है। मैंने यही प्रेम देखा था और इसी कसौटी पर विनोद कस रही थी। कितनी मन्दबुद्धि हूँ ! छिछोरेपन को प्रेम समझे बैठी थी। कितनी स्त्रियाँ जानती हैं कि अधिकांश ऐसे ही गहनेकपड़े और हँसने-बोलने में मस्त रहने वाले जीव लम्पट होते हैं। अपनी लम्पटता को छिपाने के लिए वे यह स्वॉँग भरते रहते हैं। कुत्ते को चुप रखने के लिए उसके सामने हड्डी के टुकड़े फेंक देते हैं। बेचारी भोली-भाली उसे अपना सर्वस्व देकर खिलौने पाती है और उन्हीं में मग्न रहती है। मैं विनोद को उसी कॉँटे पर तौल रही थी—हीरे को साग के तराजू पर रख देती थी। मैं जानती हूँमेरा दृढ़ विश्वास और वह अटल है कि विनोद की दृष्टि कभी किसी पर स्त्री पर नहीं पड़ सकती। उनके लिए मै हूँअकेली मै हूँअच्छी हूँ या बुरी हूँजो कुछ हूँमै हूँ। बहनमेरी तो मारे गर्व और आनन्द से छाती फूल उठी है। इतना बड़ा साम्राज्य—इतना अचलइतना स्वरक्षितकिसी हृदयेश्वरी को नसीब हुआ है ! मुझे तो सन्देह है। और मैं इस पर भी असन्तुष्ट थीयह न जानती थी कि ऊपर बबूले तैरते हैंमोती समुद्र की तह मे मिलते हैं। हाय! मेरी इस मूर्खता के कारणमेरे प्यारे  विनोद को कितनी मानसिक वेदना हो रही है। मेरे जीवन-धनमेरे जीवन-सर्वस्व न जाने कहॉँ मारे-मारे फिरते होंगेंन जाने किस दशा में होगेंन-जाने मेरे प्रति उनके मन में कैसी-कैसी शंकाऍं उठ रही होंगी—प्यारे ! तुमने मेरे साथ कुछ कम अन्याय नहीं किया। अगर मैने तुम्हें निष्ठुर समझातो तुमने तो मुझे उससे कहीं बदतर समझा—क्या अब भी पेट नहीं भरातुमने मुझे इतनी गयी-गुजरी समझ लिया कि इस अभागे भुवन… मै ऐसे-ऐसे एक लाख भुवनों को तुम्हारे चरणों पर भेंट कर सकती हूँ। मुझे तो संसार में ऐसा कोई प्राणी ही नहीं नजर आताजिस पर मेरी निगाह उठ सके। नहींतुम मुझे इतनी नीचइतनी कलंकिनी नहीं समझ सकते—शायद वह नौबत आतीतो तुम और मैं दो में से एक भी इस संसार में न होता।

बहनमैंने विनोद को बुलाने कीखींच लाने कीपकड़ मँगवाने की एक तरकीब सोची है। क्या कहूँपहले ही दिन यह तरकीब क्यों न सूझी विनोद को दैनिक पत्र पढ़े बिना चैन नहीं आता और वह कौन-सा पत्र पढ़ते हैंमैं यह भी जानती हूँ। कल के पत्र में यह खबर छपेगी—‘पद्मा मर रही है’और परसों विनोद यहॉँ होंगे—रुक ही नहीं सकते। फिर खूब झगड़े होंगेखूब लड़ाइयॉँ होंगी।

अब कुछ तुम्हारे विषय में। क्या तुम्हारी बुढ़िया सचमुच तुमसे इसलिए जलती है कि तुम सुन्दर होशिक्षित हो खूब ! और तुम्हारे आनन्द भी विचित्र जीव मालूम होते हैं। मैने सुना है कि पुरुष कितना ही कुरूप होउसकी निगाह अप्सराओं ही पर जाकर पड़ती है। फिर आन्नद बाबू तुमसे क्यों बिचकते हैजरा गौरसे देखनाकहीं राधा और कृष्ण के बीच में कोई कुब्जा तो नहींअगर सासजी यों ही नाक में दम करती रहेंतो मैं तो यही सलाह दूँगी कि अपनी झोपड़ी अलग बना लो। मगर जानती हूँतुम मेरी यह सलाह न मानोगीकिसी तरह न मानेगी। इस सहिष्णुता के लिए मैं तुम्हें बधाई देती हूँ। पत्र जल्द लिखना। मगर शायद तुम्हारा पत्र आने के पहले ही मेरा दूसरा पत्र पहुँचे।

तुम्हारी,

पद्मा

12

काशी

10-2-26

 

प्रिय पद्मा,

कई दिन तक तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा करने के बाद आज यह खत लिख रही हूँ। मैं अब भी आशा कर रही हूँ कि विनोद बाबू घर आ गये होगेंमगर अभी वह न आये हों और तुम रो-रोकर अपनी ऑंखे फोड़े डालती होतो मुझे जरा भी दु:ख न होगा! तुमने उनके साथ जो अन्याय किया हैउसका यही दण्ड है। मुझे तुमसे जरा भी सहानुभूति नहीं है। तुम गृहिणी होकर वह कुटिल क्रीड़ा  करने चली थींजो प्रेम का सौदा करने वाली स्त्रियों को ही शोभा देती है। मैं तो जब खुश होती कि विनोद ने तुम्हारा गला घोंट दिया होता और भुवन के कुसंस्कारों को सदा के लिए शांत कर देते। तुम चाहे मुझसे रूठ ही क्यों न जाओ पर मैं इतना जरूर कहूँगी कि तुम विनोद के योग्य नहीं हो। शायद तुमने अँग्रेजी किताबों मे पढ़ा होगा कि स्त्रियाँ छैले रसिकों पर ही जान देती हैं और यह पढ़कर तुम्हारा सिर फिर गया है। तुम्हें नित्य कोई सनसनी चाहिएअन्यथा तुम्हारा जीवन शुष्क हो जायेगा। तुम भारत की पतिपरायणा रमणी नहींयूरोप की आमोदप्रिय युवती हो। मुझे तुम्हारे ऊपर दया आती है। तुमने अब तक रूप को ही आकर्षण का मूल समझ रखा है। रूप में आर्कषण हैमानती हूँ। लेकिन उस आकर्षण का नाम मोह हैवह स्थायी नहींकेवल धोखे की टट्टी है। प्रेम का एक ही मूल मंत्र हैऔर वह है सेवा। यह मत समझो कि जो पुरूष तुम्हारे ऊपर भ्रमर की भॉँति मँडराया करता हैवह तुमसे प्रेम करता है। उसकी यह रूपासक्ति बहुत दिनों तक नहीं रहेगी। प्रेम का अंकुर रूप में हैपर उसको पल्लवित और पुष्पित करना सेवा ही का काम है। मुझे विश्वास नहीं आता कि विनोद को बाहर से थके-मॉँदेपसीने मे तर देखकर तुमने कभी पंखा झला होगा। शायद टेबुल-फैन लगाने की बात भी न सूझी होगी। सच कहनामेरा अनुमान ठीक या नहींबतलाओतुमने की उनके पैरों में चंपी की हैकभी उनके सिर में तेज डाला हैतुम कहोगीयह खिदमतगारों का काम हैलेडियाँ यह मरज नहीं पालतीं। तुमने उस आनन्द का अनुभव ही नहीं किया। तुम विनोद को अपने अधिकार में रखना चाहती होमगर उसका साधन नहीं करतीं। विलासनी मनोरंजन कर सकती हैचिरसंगिनी नहीं बन सकती। पुरूष के गले से लिपटी हुई भी वह उससे कोसों दूर रहती है। मानती हूँरूपमोह मनुष्य का स्वभाव हैलेकिन रूप से हृदय की प्यास नहीं बुझतीआत्मा की तृप्ति नहीं होती। सेवाभाव रखने वाली रूप-विहीन स्त्री का पति किसी स्त्री के रूप-जाल मे फँस जायतो बहुत जल्द निकल भागता हैसेवा का चस्का पाया हुआ मन केवल नखरों और चोचलों पर लट्टू नहीं होता। मगर मैं तो तुम्हें उपदेश करने बैठ गयीहालॉँकि तुम मुझसे दो-चार महीने बड़ी होगी। क्षमा करो बहनयह उपदेश नहीं है। ये बातें हम-तुम सभी जानते हैंकेवल कभी-कभी भूल जाते हैं। मैंने केवल तुम्हें याद दिला दिया हैं। उपदेश मे हृदय नहीं होतालेकिन मेरा उपदेश मेरे मन की वह व्यथा हैजो तुम्हारी इस नयी विपत्ति से जागरित हुई है।

अच्छाअब मेरी रामकहानी सुनो। इस एक महीने में यहॉँ बड़ी-बड़ी घटनाऍं हो गयीं। यह तो मैं पहले ही लिख चुकी हूँ कि आनन्द बाबू और अम्मॉँजी में कुछ मनमुटाव रहने लगा। वह आग भीतर-ही-भीतर सुलगती रहती थी। दिन में दो-एक बार मॉँ बेटे में चोंचें हो जाती थी। एक दिन मेरी छोटी ननदजी मेरे कमरे से एक पुस्तक उठा ले गयीं। उन्हें पढ़ने का रोग है। मैंने कमरे में किताब न देखीतो उनसे पूछा। इस जरा-सी बात पर वह भले-मानस बिगड़ गयी और कहने लगी—तुम तो मुझे चोरी लगाती हो। अम्मॉँ ने उन्हीं का पक्ष लिया और मुझे खूब सुनायी। संयोग की बातअम्मॉँजी मुझे कोसने ही दे रही थीं कि आन्नद बाबू घर में आ गये। अम्माँजी उन्हें देखते ही और जोर से बकने लगींबहू की इतनी मजाल! वह तूने सिर पर चढ़ा रखा है और कोई बात नहीं। पुस्तक क्या उसके बाप की थीलड़की लायीतो उसने कौन गुनाह कियाजरा भी सब्र न हुआदौड़ी हुई उसके सिर पर जा पहुँची और उसके हाथों से किताब छीनने लगी।

बहनमैं यह स्वीकार करती हूँ कि मुझे पुस्तक के लिए इतनी उतावली न करनी चाहिए थी। ननदजी पढ़ चुकने पर आप ही दे जातीं। न भी देतीं तो उस एक पुस्तक के न पढ़ने से मेरा क्या बिगड़ा जाता था। मगर मेरी शामत कि उनके हाथों से किताब छीनने लगी थी। अगर इस बात पर आनन्द बाबू मुझे डाँट बतातेतो मुझे जरा भी दु:ख न होता मगर उन्होंने उल्टे मेरा पक्ष लिया और त्योरियाँ चढ़ाकर बोले—किसी की चीज कोई बिना पूछे लाये ही क्योंयह तो मामूली शिष्टाचार है।

इतना सुनना था कि अम्मॉँ के सिर पर भूत-सा सवार हो गया। आनन्द बाबू भी बीच-बीच मे फुलझड़ियॉँ छोड़ते रहे और मैं अपने कमरे में बैठी रोती रही कि कहॉँ-से-कहॉँ मैंने किताब मॉँगी। न अम्मॉँजी ही ने भोजन

 

 

पेज 6

दो सखियाँ

कियान आनन्द बाबू ने ही। और मेरा तो बार-बार यही जी चाहता था कि जहर खा लूँ। रात को जब अम्मॉजी लेटी तो मैं अपने नियम के अनुसार उनके पॉँव पक्रड़ लिये। मैं पैंताने की ओर तो थी ही। अम्मॉँजी ने जो पैर से मुझे ढकेला तो मैं चारपाई के नीचे गिर पड़ी। जमीन पर कई कटोरियॉँ पड़ी हुई थीं। मैं उन कटोरियों पर गिरीतो पीठ और कमर में बड़ी चोट आयी। मैं चिल्लाना न चाहती थीमगर न जाने कैसे मेरे मुँह से चीख निकल गयी। आनन्द बाबू अपने कमरे में आ गये थेमेरी चीख सुनकर दौड़े पड़े और अम्मॉँजी के द्वार पर आकर बोले—क्या उसे मारे डालती होअम्मॉँअपराधी तो मैं हूँउसकी जान क्यों ले रही होयह कहते हुए वह कमरे में घुस गये और मेरा हाथ पकड़ कर जबरदस्ती खींच ले गये। मैंने बहुत चाहा कि अपना हाथ छुड़ा लूँपर आन्नद ने न छोड़ा! वास्वत में इस समय उनका हम लोगों के बीच में कूद पड़ना मुझे अच्छा नहीं लगता था। वह न आ जातेतो मैंने रो-धोकर अम्मॉँजी को मना लिया होता। मेरे गिर पड़ने से उनका क्रोध कुछ शान्त हो चला था। आनन्द का आ जाना गजब हो गया। अम्मॉँजी कमरे के बाहर निकल आयीं और मुँह चिढ़ाकर बोली—हॉँदेखोमरहम-पट्टी कर दोकहीं कुछ टूट-फूट न गया हो !

आनन्द ने ऑंगन में रूककर कहा—क्या तुम चाहती हो कि तुम किसी को मार डालो और मैं न बोलूँ ?

हॉँमैं तो डायन हूँआदमियों को मार डालना ही तो मेरा काम है। ताज्जुब है कि मैंने तुम्हें क्यों न मार डाला।’

तो पछतावा क्यों हो रहा हैधेले की संखिया में तो काम चलता है।‘

अगर तुम्हें इस तरह औरत को सिर चढ़ाकर रखना हैतो कहीं और ले जाकर रखो। इस घर में उसका निर्वाह अब न होगा।’

मैं खुद इसी फ्रिक में हूँतुम्हारे कहने की जरूरत नहीं।’

मैं भी समझ लूँगी कि मैंने लड़का ही नहीं जना।’

मैं भी समझ लूँगा कि मेरी माता मर गयी।’

मैं आनन्द का हाथ पकड़कर जोर से खींच रही थी कि उन्हें वहॉँ से हटा ले जाऊँमगर वह बार-बार मेरा हाथ झटक देते थे। आखिर जब अम्मॉँजी अपने कमरे में चली गयींतो वह अपने कमरे में आये और सिर थामकर बैठ गये।

मैंने कहा—यह तुम्हें क्या सूझी ?

आनन्द ने भूमि की ओर ताकते हुए कहा—अम्मॉँ ने आज नोटिस दे दिया।

तुम खुद ही उलझ पड़ेवह बेचारी तो कुछ बोली नहीं।’

मैं ही उलझ पड़ा !’

और क्या। मैंने तो तुमसे फरियाद न की थी।’

पकड़ न लातातो अम्माँ ने तुम्हें अधमरा कर दिया होता। तुम उनका क्रोध नहीं जानती।’

यह तुम्हारा भ्रम है। उन्होंने मुझे मारा नहींअपना पैर छुड़ा रही थीं। मैं पट्टी पर बैठी थीजरा-सा धक्का खाकर गिर पड़ीं। अम्मॉँ मुझे उठाने ही जा रही थीं कि तुम पहुँच गये।’

नानी के आगे ननिहाल का बखान न करोमैं अम्मॉँ को खूब जानता हूँ। मैं कल ही दूसरा घर ले लूँगायह मेरा निश्चय है। कहीं-न-कहीं नौकरी मिल ही जायेगी। ये लोग समझते हैं कि मैं इनकी रोटियों पर पड़ा हुआ हूँ। इसी से यह मिजाज है !’

मैं जितना ही उनको समझती थीउतना वह और बफरते थे। आखिर मैंने झुँझलाकर कहा—तो तुम अकेले जाकर दूसरे घर में रहो। मैं न जाऊँगी। मुझे यहीं पड़ी रहने दो।

आनन्द ने मेरी ओर कठोर नेत्रों से देखकर कहा—यही लातें खाना अच्छा लगता है?

हाँमुझे यही अच्छा लगता है।’

तो तुम खाओमैं नहीं खाना चाहता। यही फायदा क्या थोड़ा है कि  तुम्हारी दुर्दशा ऑंखों से न देखूँगान पीड़ा होगी।’

अलग रहने लगोगेतो दुनिया क्या कहेगी।’

इसकी परवाह नहीं। दुनियां अन्धी है।’

लोग यही कहेंगे कि स्त्री ने यह माया फैलायी है।‘

इसकी भी परवाह नहींइस भय से अपना जीवन संकट में नहीं डालना चाहता।’

मैंने रोकर कहा—तुम मुझे छोड़ दोगेतुम्हें मेरी जरा भी मुहब्बत नहीं है। बहनऔर किसी समय इस प्रेम-आग्रह से भरे हुए शब्दों ने न जाने क्या कर दिया होता। ऐसे ही आग्रहों पर रियासतें मिटती हैंनाते टूटते हैंरमणी के पास इससे बढ़कर दूसरा अस्त्र नहीं। मैंने आनन्द के गले में बाँहें डाल दी थीं और उनके कन्धे पर सिर रखकर रो रही थी। मगर इस समय आनन्द बाबू इतने कठोर हो गये थे कि यह आग्रह भी उन पर कुछ असर न कर सका। जिस माता न जन्म दियाउसके प्रति इतना रोष ! हम अपनी माता की एक कड़ी बात नहीं सह सकतेइस आत्माभिमान का कोई ठिकाना है। यही वे आशाऍं हैंजिन पर माता ने अपने जीवन के सारे सुख-विलास अर्पण कर दिये थेदिन का चैन और रात की नींद अपने ऊपर हराम कर ली थी ! पुत्र पर माता का इतना भी अधिकार नहीं !

आनन्द ने उसी अविचलित कठोरता से कहा—अगर मुहब्बत का यही अर्थ है कि मैं इस घर में तुम्हारी दुर्गति कराऊँतो मुझे वह मुहब्बत नहीं है।

प्रात:काल वह उठकर बाहर जाते हुए मुझसे बोले—मैं जाकर घर ठीक किये आता हूँ। तॉँगा भी लेता आऊँगातैयार रहना।

मैंने दरवाजा रोककर कहा—क्या अभी तक क्रोध शान्त नहीं हुआ?

क्रोध की बात नहींकेवल दूसरों के सिर से अपना बोझ हटा लेने की बात है।’

यह अच्छा काम नहीं कर रहे हो। सोचोमाता जी को कितना दु:ख होगा। ससुरजी से भी तुमने कुछ पूछा ?’

उनसे पूछने की कोई जरूरत नहीं। कर्ता-धर्ता जो कुछ हैंवह अम्मॉँ हैं। दादाजी मिट्टी के लोंदे हैं।’

घर के स्वामी तो हैं ?‘

तुम्हें चलना है या नहींसाफ कहो।’

मैं तो अभी न जाऊँगी।’

अच्छी बात हैलात खाओ।’

मैं कुछ नहीं बोली। आनन्द ने एक क्षण के बाद फिर कहा—तुम्हारे पास कुछ रूपये होतो मुझे दो।

मेरे पास रूपये थेमगर मैंने इनकार कर दिया। मैंने समझाशायद इसी असमंजस में पड़कर वह रूक जायँ। मगर उन्होंने बात मन में ठान ली थी। खिन्न होकर बोले—अच्छी बात हैतुम्हारे रूपयों के बगैर भी मेरा काम चल जायगा। तुम्हें यह विशाल भवनयह सुख-भोगये नौकर-चाकरये ठाट-बाट मुबारक हों। मेरे साथ क्यों भूखों मरोगी। वहॉँ यह सुख कहॉँ ! मेरे प्रेम का मूल्य ही क्या !

यह कहते हुए वह चले गये। बहनक्या कहूँउस समय अपनी बेबसी पर कितना दु:ख हो रहा था। बसयही जी में आता था कि यमराज आकर मुझे उठा ले जायें। मुझे कल-कलंकिनी के कारण माता और पुत्र में यह वैमनस्य हो रहा था। जाकर अम्मॉँजी के पैरों पर गिर पड़ी और रो-रोकर आनन्द बाबू के चले जाने का समाचार कहा। मगर माताजी का हृदय जरा भी न पसीजा। मुझे आज मालूम हुआ कि माता भी इतनी वज्र-हृदया हो सकती है। फिर आनन्द बाबू का हृदय क्यों न कठोर हो। अपनी माता ही के पुत्र तो हैं।

माताजी ने निर्दयता से कहा—तुम उसके साथ क्यों न चली गयी जब वह कहता था तब चला जाना चाहिए था। कौन जानेयहॉँ मैं किसी दिन तुम्हें विष दे दूँ।

मैंने गिड़गिड़ाकर कहा—अम्मॉँजीउन्हें बुला भेजिएआपके पैरों पड़ती हूँ। नहीं तो कहीं चले जायेंगे।

अम्मॉँ उसी निर्दयता से बोलीं—जाय चाहे रहेवह मेरा कौन है। अब तो जो कुछ होतुम होमुझे कौन गिनता है। आज जरा-सी बात पर यह इतना झल्ला रहा है। और मेरी अम्माँजी ने मुझे सैकड़ों ही बार पीटा होगा। मैं भी छोकरी न थीतुम्हारी ही उम्र की थीपर मजाल न थी कि तुम्हारे दादाजी से किसी के सामने बोल सकूँ। कच्चा ही खा जातीं ! मार खाकर रात-भर रोती रहती थीपर इस तरह घर छोड़कर कोई न भागता था। आजकल के लौंडे ही प्रेम करना नहीं जानतेहम भी प्रेम करते थेपर इस तरह नहीं कि मॉँ-बापछोटे-बड़े किसी को कुछ न समझें।

यह कहती हुई माताजी पूजा करने चली गयी। मैं अपने कमरे में आकर नसीबों को रोने लगी। यही शंका होती थी कि आनन्द किसी तरफ की राह न लें। बार-बार जी मसोसता था कि रूपये क्यों न दे दिये। बेचारे इधर-उधर मारे-मारे फिरते होंगे। अभी हाथ-मुँह भी नहीं धोयाजलपान भी नहीं किया। वक्त पर जलपान न करेंगे तोजुकाम हो जायेगाऔर उन्हें जुकाम होता हैतो हरारत भी हो जाती है। महरी से कहा—जरा जाकर देख तो बाबूजी कमरे में हैंउसने आकर कहा—कमरे में तो कोई नहींखूँटी पर कपड़े भी नहीं है।

मैंने पूछा—क्या और भी कभी इस तरह अम्मॉँजी से रूठे हैंमहरी बोली—कभी नहीं बहू ऐसा सीधा तो मैंने लड़का ही नहीं देखा। मालकिन के सामने कभी सिर नहीं उठाते थे। आज न-जाने क्यों चले गए।

मुझे आशा थी कि दोपहर को भोजन के समय वह आ जायेँगे। लेकिन दोपहर कौन कहेशाम भी हो गयी और उनका पति नहीं। सारी रात जागती रही। द्वार की ओर कान लगे हुए थे। मगर रात भी उसी तरह गुजर गयी। बहनइस प्रकार पूरे तीन बीत गये। उस वक्त तुम मुझे देखतींतो पहचान न सकतीं। रोते-रोते आँखें लाल हो गयी थीं। इन तीन दिनों में एक पल भी नहीं सोयी और भूख का तो जिक्र ही क्यापानी तक न पिया। प्यास ही न लगती थी। मालूम होता थादेह में प्राण ही नहीं हैं। सारे घर में मातम-सा छाया हुआ था। अम्मॉँजी भोजन करने दोनों वक्त जाती थींपर मुँह जूठा करके चली आती थी। दोनों ननदों की हँसी और चुहर भी गायब हो गयी थी। छोटी ननदजी तो मुझसे अपना अपराध क्षमा कराने आयी।

चौथे दिन सबेरे रसोइये ने आकर मुझसे कहा—बाबूजी तो अभी मुझे दशाश्वमेध घाट पर मिले थे। मैं उन्हें देखते ही लपककर उनके पास आ पहुँचा और बोला—भैयाघर क्यों नहीं चलतेसब लोग घबड़ाये हुए हैं। बहूजी ने तीन दिन से पानी तक पिया। उनका हाल बहुत बुरा है। यह सुनकर वह कुछ सोच में पड़ गयेफिर बोले—बहूजी ने क्यों दाना-पानी छोड़ रखा हैजाकर कह देनाजिस आराम के लिए उस घर को न छोड़ सकीउससे क्या इतनी जल्द जी-भर गया !

अम्मॉँजी उसी समय आँगन में आ गयी। महाराज की बातों की भनक कानों में पड़ गयीबोली—क्या है अलगूक्या आनन्द मिला था ?

महाराज—हाँबड़ी बहूअभी दशाश्वमेध घाट पर मिले थे। मैंने कहा—घर क्यों नहीं चलतेतो बोले—उस घर में मेरा कौन बैठा हुआ है?

अम्मॉँ—कहा नहीं और कोई अपना नहीं हैतो स्त्री तो अपनी हैउसकी जान क्यों लेते हो?

महाराज—मैंने बहुत समझाया बड़ी बहूपर वह टस-से-मस न हुए।

अम्मॉँ—करता क्या है?

महाराज—यह तो मैंने नहीं पूछापर चेहरा बहुत उतरा हुआ था।

अम्मॉँ—ज्यों-ज्यों तुम बूढ़े होते होशायद सठियाते जाते हो। इतना तो पूछा होताकहॉँ रहते होकहॉँ खाते-पीते हो। तुम्हें चाहिए थाउसका हाथ पकड़ लेते और खींचकर ले आते। मगर तुम नकमहरामों को अपने हलवे-मांडे से मतलबचाहे कोई मरे या जिये। दोनों वक्त बढ़-बढ़कर हाथ मारते हो और मूँछों पर ताव देते हो। तुम्हें इसकी क्या परवाह है कि घर में दूसरा कोई खाता है या नहीं। मैं तो परवाह न करतीवह आये या न आये। मेरा धर्म पालना-पोसना थापाल पोस दिया। अब जहॉँ चाहे रहे। पर इस बहू का क्या करूँजो रो-रोकर प्राण दिये डालती है। तुम्हें ईश्वर ने आँखे दी हैंउसकी हालत देख रहे हो। क्या मुँह से इतना भी न फूटा कि बहू अन्न जल त्याग किये पड़ी हुई।

महाराज—बहूजीनारायण जानते हैंमैंने बहुत तरह समझायामगर वह तो जैसे भागे जाते थे। फिर मैं क्या करता।

अम्मॉँ—समझाया नहींअपना सिर। तुम समझाते और वह योंही चला जाता। क्या सारी लच्छेदार बातें मुझी से करने को हैइस बहू को मैं क्या कहूँ। मेरे पति ने मुझसे इतनी बेरूखी की होतीतो मैं उसकी सूरत न देखती। परइस पर उसने न-जाने कौन-सा जादू कर दिया है। ऐसे उदासियों को तो कुलटा चाहिएजो उन्हें तिगनी का नाच नचाये।

कोई आध घंटे बाद कहार ने आकर कहा—बाबूजी आकर कमरे में बैठे हुए हैं।

मेरा कलेजा धक-धक करने लगा। जी चाहता था कि जाकर पकड़ लाऊँपर अम्मॉँजी का हृदय सचमुच वज्र है। बोली—जाकर कह देयहॉँ उनका कौन बैठा हुआ हैजो आकर बैठे हैं !

मैंने हाथ जोड़कर कहा—अम्मॉँजीउन्हें अन्दर बुला लीजिएकहीं फिर न चले जाऍं।

अम्मॉँ—यहॉँ उनका कौन बैठा हुआ हैजो आयेगा। मैं तो अन्दर कदम न रखने दूँगी।

अम्मॉँजी तो बिगड़ रही थीउधर छोटी ननदजी जाकर आनन्द बाबू को लायी। सचमुच उनका चेहरा उतरा हुआ थाजैसे महीनों का मरीज हो। ननदजी उन्हें इस तरह खीचें लाती थीजैसे कोई लड़की ससुराल जा रही  हो। अम्मॉँजी ने मुस्काराकर कहा—इसे यहॉँ क्यों लायींयहॉँ इसका कौन बैठा हुआ है?

आनन्द सिर झुकाये अपराधियों की भॉँति खड़े थे। जबान न खुलती थी। अम्मॉँजी ने फिर पूछा—चार दिन से कहॉँ थे?

कहीं नहीयहीं तो था।’

खूब चैन से रहे होगे।’

जी हॉँकोई तकलीफ न थी।’

वह तो सूरत ही से मालूम हो रहा है।’

ननदजी जलपान के लिए मिठाई लायीं। आनन्द मिठाई खाते इस तरह झेंप रहे थे मानों ससुराल आये होंफिर माताजी उन्हें लिए अपने कमरे में चली गयीं। वहॉँ आध घंटे तक माता और पुत्र में बातें होती रही। मैं कान लगाये हुए थीपर साफ कुछ न सुनायी देता था। हॉँऐसा मालूम होता था कि कभी माताजी रोती हैं और कभी आन्नद। माताजी जब पूजा करने निकलींतो उनकी आँखें लाल थीं। आनन्द वहॉँ से निकलेतो सीधे मेरे कमरे में आये। मैं उन्हें आते देख चटपट मुँह ढॉँपकर चारपाई पर रहीमानो बेखबर सो रही हूँ। वह कमरे में आयेमुझे चरपाई पर पड़े देखामेरे समीप आकर एक बार धीरे पुकारा और लौट पड़े। मुझे जगाने की हिम्मत न पड़ी। मुझे जो कष्ट हो रहा थाइसका एकमात्र कारण अपने को समझकर वह मन-ही-मन दु:खी हो रहे थे। मैंने अनुमान किया थावह मुझे उठायेंगेमैं मान करूँगीवह मनायेंगेमगर सारे मंसूबे खाक में मिल गए। उन्हें लौटते देखकर मुझसे न रहा गया। मैं हकबकाकर उठ बैठी और चारपाई से नीचे उतरने लगीमगर न-जाने क्योंमेरे पैर लड़खड़ाये और ऐसा जान पड़ा मैं गिरी जाती हूँ। सहसा आनन्द ने पीछे फिर कर मुझे संभाल लिया और बोले—लेट जाओलेट जाओमैं कुरसी पर बैठा जाता हूँ। यह तुमने अपनी क्या गति बना रखी है?

मैंने अपने को सँभालकर कहा—मैं तो बहुत अच्छी तरह हूँ। आपने कैसे कष्ट किया?

पहले तुम कुछ भोजन कर लोतो पीछे मैं कुछ बात करूँगा।’

मेरे भोजन की आपको क्या फिक्र पड़ी है। आप तो सैर सपाटे कर रहे हैं !’

जैसे सैर-सपाटे मैंने किये हैंमेरा दिल जानता है। मगर बातें पीछे करूँगाअभी मुँह-हाथ धोकर खा लो। चार दिन से पानी तक मुँह में नहीं डाला। राम ! राम !’

यह आपसे किसने कहा कि मैंने चार दिन से पानी तक मुँह में नहीं डाला। जब आपको मेरी परवाह न थीतो मैं क्यों दाना-पानी छोड़ती?’

वह तो सूरत ही कहे देती हैं। फूल से… मुरझा गये।’

जरा अपनी सूरत जाकर आईने में देखिए।’

मैं पहले ही कौन बड़ा सुन्दर था। ठूँठ को पानी मिले तो क्या और न मिले तो क्या। मैं न जानता था कि तुम यह अनशन-व्रत ले लोगीनहीं तो ईश्वर जानता हैअम्मॉँ मार-मारकर भगातींतो भी न जाता।’

मैंने तिरस्कार की दृष्टि से देखकर कहा—तो क्या सचमुच तुम समझे थे कि मैं यहाँ केवल आराम के विचार से रह गयी?

आनन्द ने जल्दी से अपनी भूल सुधरी—नहींनहीं प्रियेमैं इतना गधा नहीं हूँपर यह मैं कदापि न समझता था कि तुम बिलकुल दाना-पानी छोड़ दोगी। बड़ी कुशल हुई कि मुझे महाराज मिल गयानहीं तो तुम प्राण ही दे देती। अब ऐसी भूल कभी न होगी। कान पकड़ता हूँ। अम्मॉँजी तुम्हारा बखान कर-करके रोती रही।

मैंने प्रसन्न होकर कहा—तब तो मेरी तपस्या सफल हो गयी।

थोड़ा-सा दूध पी लोतो बातें हों। जाने कितनी बातें करनी है।

पी लूँगीऐसी क्या जल्दी है।’

जब तक तुम कुछ खा न लोगीमैं यही समझूँगा कि तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया।’

मैं भोजन जभी करूँगीजब तुम यह प्रतिज्ञा करो कि फिर कभी इस तरह रूठकर न जाओगे।’

मैं सच्चे दिल से यह प्रतिज्ञा करता हूँ।’

बहनतीन दिन कष्ट तो हुआपर मुझे उसके लिए जरा भी पछतावा नहीं है। इन तीन दिनों के अनशन ने दिलों मे जो सफाई कर दीवह किसी दूसरी विधि से कदापि न होती। अब मुझे विश्वास है कि हमारा जीवन शांति से व्यतीत होगा। अपने समाचार शीघ्रअति शीघ्र लिखना।

तुम्हारी

चन्दा

 

13

दिल्ली

20-2-26

 

प्यारी बहन,

तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे तुम्हारे ऊपर दया आयी। तुम मुझे कितना ही बुरा कहोपर मैं अपनी यह दुर्गति किसी तरह न सह सकतीकिसी तरह नहीं। मैंने या तो अपने प्राण ही दे दिये होतेया फिर उस सास का मुँह न देखती। तुम्हारा सीधापनतुम्हारी सहनशीलतातुम्हारी सास-भक्ति तुम्हें मुबारक हो। मैं तो तुरन्त आनन्द के साथ चली जाती और चाहे भीख ही क्यों न माँगनी पड़ती उस घर में कदम न रखती। मुझे तुम्हारे ऊपर दया ही नहीं आतीक्रोध भी आता हैइसलिए कि तुममें स्वाभिमान नहीं है। तुम-जैसी स्त्रियों ने ही सासों और पुरूषों का मिजाज आसमान चढ़ा दिया है। ‘जहन्नुम में जाय ऐसा घर—जहॉँ अपनी इज्जत नहीं।’ मैं पति-प्रेम भी इन दामों न लूँ। तुम्हें उन्नीसवी सदी में जन्म लेना चाहिए था। उस वक्त तुम्हारे गुणों की प्रशंसा होती। इस स्वाधीनता और नारी-स्वत्व के नवयुग में तुम केवल प्राचीन इतिहास हो। यह सीता और दमयन्ती का युग नहीं। पुरूषों ने बहुत दिनों तक राज्य किया। अब स्त्री-जाति का राज्य होगा। मगर अब तुम्हें अधिक न कोसूँगी।

अब मेरा हाल सुनो। मैंने सोचा थापत्रों में अपनी बीमारी का समाचार छपवा दूँगी। लेकिन फिर ख्याल आयायह समाचार छपते ही मित्रों का तॉँता लग जायेगा। कोई मिजाज पूछने आयेगा। कोई देखने आयेगा। फिर मैं कोई रानी तो हूँ नहींजिसकी बिमारी का बुलेटिन रोजाना छापा जाय। न जाने लोगों के दिल में कैसे-कैसे विचार उत्पन्न हों। यह सोचकर मैंने पत्र में छपवाने का विचार छोड़ दिया। दिन-भर मेरे चित्त की क्या दशा रहीलिख नहीं सकती। कभी मन में आताजहर खा लूँकभी सोचतीकहीं उड़ जाऊं। विनोद के सम्बन्ध में भॉँति-भॉँति की शंकाऍं होने लगीं। अब मुझे ऐसी कितनी ही बातें याद आने लगींजब मैंने विनोद के प्रति उदासीनता का भाव दिखाया था। मैं उनसे सब कुछ लेना चाहती थीदेना कुछ न चाहती थी। मैं चाहती थी कि वह आठों पहर भ्रमर की भॉँति मुझ पर मँडराते रहेंपतंग की भॉँति मुझे घेरे रहें। उन्हें किताबो और पत्रों में मग्न बैठे देखकर मुझे झुँझलाहट होने लगती थी। मेरा अधिकांश समय अपने ही बनाव-सिंगार में कटता थाउनके विषय में मुझे कोई चिन्ता ही न होती थी। अब मुझे मालूम हुआ कि सेवा का महत्व रूप से कहीं अधिक है। रूप मन को मुग्ध कर सकता हैपर आत्मा को आनन्द पहुँचाने वाली कोई दूसरी ही वस्तु है।

इस तरह एक हफ्ता गुजर गया। मैं प्रात:काल मैके जाने की तैयारियाँ कर रही थी—यह घर फाड़े खाता था—कि सहसा डाकिये ने मुझे एक पत्र लाकर दिया। मेरा हृदय धक-धक करने लगा। मैंने कॉँपते हुए हाथों से पत्र लियापर सिरनामे पर विनोद की परिचित हस्तलिपि न थीलिपि किसी स्त्री की थीइसमें सन्देह न थापर मैं उससे सर्वथा अपरिचित थी। मैंने तुरन्त पत्र खोला और नीचे की तरफ देखा तो चौंक पड़ी—वह कुसुम का पत्र था। मैंने एक ही साँस में सारा पत्र पढ़ लिया। लिखा था—‘बहनविनोद बाबू तीन दिन यहॉँ रहकर बम्बई चले गये। शायद विलायत जाना चाहते हैं। तीन-चार दिन बम्बई रहेंगे। मैंने बहुत चाहा तकि उन्हें दिल्ली वापस कर दूँपर वह किसी तरह न राजी हुए। तुम उन्हें नीचे लिखे पते से तार दे दो। मैंने उनसे यह पता पूछ लिया था। उन्होंने मुझे ताकीद कर दी थी कि इस पते को गुप्त रखनालेकिन तुमसे क्या परदा। तुम तुरन्त तार दे दोशायद रूक जायॅ। वह बात क्या हुई ! मुझसे विनोद ने तो बहुत पूछने पर भी नहीं बतायापर वह दु:खी बहुत थे। ऐसे आदमी को भी तुम अपना न बना सकीइसका मुझे आश्चर्य हैपर मुझे इसकी पहले ही शंका थी। रूप और गर्व में दीपक और प्रकाश का सम्बन्ध है। गर्व रूप का प्रकाश है।’…

मैंने पत्र रख दिया और उसी वक्त विनोद के नाम तार भेज दिया कि बहुत बीमार हूँतुरन्त आओ। मुझे आशा थी कि विनोद तार द्वारा जवाब देंगेलेकिन सारा दिन गुजर गया और कोई जवाब न आया। बँगले के सामने से कोई साइकिल निकलतीतो मैं तुरन्त उसकी ओर ताकने लगती थीं कि शायद तार का चपरासी हो। रात को भी मैं तार का इन्तजार करती रही। तब मैंने अपने मन को इस विचार से शांत किया कि विनोद आ रहे हैंइसलिए तार भेजने की जरूरत न समझी।

अब मेरे मन में फिर शकाएँ उठने लगी। विनोद कुसुम के पास क्यों गयेकहीं कुसुम से उन्हें प्रेम तो नहीं हैंकहीं उसी प्रेम के कारण तो वह मुझसे विरक्त नहीं हो गयेकुसुम कोई कौशल तो नहीं कर रही हैंउसे विनोद को अपने घर ठहराने का अधिकार ही क्या थाइस विचार से मेरा मन बहुत क्षुब्ध हो उठा। कुसुम पर क्रोध आने लगा। अवश्य दोनों में बहुत दिनों से पत्र-व्यवहार होता रहा होगा। मैंने फिर कुसुम का पत्र पढ़ा और अबकी उसके प्रत्येक शब्द में मेरे लिए कुछ सोचने की सामग्री रखी हुई थी। निश्चय किया कि कुसुम को एक पत्र लिखकर खूब कोसूँ। आधा पत्र लिख भी डालापर उसे फाड़ डाला। उसी वक्त विनोद को एक पत्र लिखा। तुमसे कभी भेंट होगीतो वह पत्र दिखलाऊँगीजो कुछ मुँह में आया बक डाला। लेकिन इस पत्र की भी वही दशा हुई जो कुसुम के पत्र की हुई थी। लिखने के बाद मालूम हुआ कि वह किसी विक्षप्त हृदय की बकवाद है। मेरे मन में यही बात बैठती जाती थी वह कुसुम के पास हैं। वही छलिनी उन पर अपना जादू चला रही है। यह दिन भी बीत गया। डाकिया कई बार आयापर मैंने उसकी ओर ऑंख भी नहीं उठायी। चन्दामैं नहीं कह सकतीमेरा हृदय कितना तिलतमिला रहा था। अगर कुसुम इस समय मुझे मिल जातीतो मैं न-जाने क्या कर डालती।

रात को लेटे-लेटे ख्याल आयाकहीं वह यूरोप न चले गये हों। जी बैचेन हो उठा। सिर में ऐसा चक्कर आने लगामानों पानी में डूबी जाती हूँ। अगर वह यूरोप चले गयेतो फिर कोई आशा नहीं—मैं उसी वक्त उठी और घड़ी पर नजर डाली। दो बजे थे। नौकर को जगाया और तार-घर जा पहुँची। बाबूजी कुरसी पर लेटे-लेटे सो रहे थे। बड़ी मुश्किल से उनकी नींद खुली। मैंने रसीदी तार दिया। जब बाबूजी तार दे चुकेतो मैंने पूछा— इसका जवाब कब तक आयेगा?

बाबू ने कहा—यह प्रश्न किसी ज्योतिषी से कीजिए। कौन जानता हैवह कब जवाब दें। तार का चपरासी जबरदस्ती तो उनसे जवाब नहीं लिखा सकता। अगर कोई और कारण न होतो आठ-नौ बजे तक जवाब आ जाना चाहिए।

घबराहट में आदमी की बुद्धि पलायन कर जाती है। ऐसा निरर्थक प्रश्न करके मैं स्वयं लज्जित हो गयी। बाबूजी ने अपने मन में मुझे कितना मूर्ख समझा होगाखैरमैं वहीं एक बेंच पर बैठ गयी और तुम्हें विश्वास न आयेगानौ बजे तक वहीं बैठी रही। सोचोकितने घंटे हुएपूरे सात घंटे। सैकड़ों आदमी आये और गयेपर मैं वहीं जमी बैठी रही। जब तार का डमी खटकतामेरे हृदय में धड़कन होने लगती। लेकिन इस भय से कि बाबूजी झल्ला न उठेंकुछ पूछने का साहस न करती थीं। जब दफ्तर की घड़ी में नौ बजेतो मैंने डरते-डरते बाबू से पूछा—क्या अभी तक जवाब नहीं आया।

बाबू ने कहा— आप तो यहीं बैठी हैंजवाब आता तो क्या मैं खा डालतामैंने बेहयाई करके फिर पूछा—तो क्या अब न आवेगाबाबू ने मुँह फेरकर कहा—और—दो-चार घंटे बैठी रहिए।

बहनयह वाग्बाण शर के समान हृदय में लगा। आँखे भर आयीं। लेकिन फिर मैं वह टली नहीं। अब भी आशा बँधी हुई थी कि शायद जवाब आता हो। जब दो घंटे और गुजर गयेतब मैं निराश हो गयी। हाय ! विनोद ने मुझे कहीं का न रखा। मैं घर चलीतो ऑंखें से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी। रास्ता न सूझता था।

सहसा पीछे से एक मोटर का हार्न सुनायी दिया। मैं रास्ते से हट गयी। उस वक्त मन में आयाइसी मोटर के नीचे लेट जॉँऊ और जीवन का अन्त कर दूँ। मैंने ऑंखे पोंछकर मोटर की ओर देखाभुवन बैठा हुआ था और उसकी बगल में बैठी थी कुसुम ! ऐसा जान पड़ाअग्नि की ज्वाला मेरे पैरों से समाकर सिर से निकल गयी। मैं उन दोनों की निगाहों से बचना चाहती थीलेकिन मोटर रूक गयी और कुसुम उतर कर मेरे गले से लिपट गयी। भुवन चुपचाप मोटर में बैठा रहामानो मुझे जानता ही नहीं। निर्दयीधूर्त !

कुसुम ने पूछा—मैं तो तुम्हारे पास जाती थीबहनवहॉँ से कोई खबर आयीमैंने बात टालने के लिए कहा—तुम कब आयीं?

भुवन के सामने मैं अपनी विपत्ति-कथा न कहना चाहती थी।

कुसुम—आओकार में बैठ जाओ।

नहींमैं चली जाउँगी। अवकाश मिलेतो एक बार चली आना।’

कुसुम ने मुझसे आग्रह न किया। कार में बैठकर चल दी। मैं खड़ी ताकती रह गयी ! यह वही कुसुम है या कोई औरकितना बड़ा अन्तर हो गया है?

मैं घर चलीतो सोचने लगी—भुवन से इसकी जान-पहचानकैसे हुईकहीं ऐसा तो नहीं है कि विनोद ने इसे मेरी टोह लेने को भेजा हो ! भुवन से मेरे विषय में कुछ पूछने तो नहीं आयी हैं?

मैं घर पहुँचकर बैठी ही थी कि कुसुम आ पहुँची। अब की वह मोटर में अकेली न थी—विनोद बैठे हुए थे। मैं उन्हे देखकर ठिठक गयी ! चाहिए तो यह था कि मैं दौड़कर उनका हाथ पकड़ लेती और मोटर से अतार लातीलेकिन मैं जगह से हिली तक नहीं। मूर्ति की भाँति अचल बैठी रही। मेरी मानिनी प्रकृति आपना उद्दण्ड-स्वरूप  दिखाने के लिए विकल हो उठी। एक क्षण में कुसुम ने विनोद को उतारा और उनका हाथ पकड़े हुये ले आयी। उस वक्त मैंने देखा कि विनोद का मुख बिलकुल पीला पड़ गया है और वह इतने अशक्त हो गये हैं कि अपने सहारे खड़े भी नहीं रह सकतेमैंने घबराकर पूछाक्यों तुम्हारा यह क्या हाल है?

कुसुम ने कहा—हाल पीछे पूछनाजरा इनकी चौपाई चटपट बिछा दो  और थोडा-सा दूध मँगवा लो।

मैंने तुरन्त चारपाई बिछायी और विनोद को उस पर लेटा दिया। और दूध तो रखा हुआ था। कुसुम इस वक्त मेरी स्वामिनी बनी हुई थी। मैं उसके इशारे पर नाच रही थी। चन्दाइस वक्त मुझे ज्ञात हुआ कि कुसुम पर विनोद को जितना विश्वास हैवह मुझ पर नहीं। मैं इस योग्य हूँ ही नहीं। मेरा दिल सैकड़ों प्रश्न पूछने के लिए तड़फड़ा रहा थालेकिन कुसुम एक पल के लिए भी विनोद के पास से ने टलती थी। मैं इतनी मूर्ख हूँ कि अवसर पाने पर इस दशा में भी मैं विनोद से प्रश्नों का तॉँता बॉँध देती।

विनोद को जब नींद आ गयीमैंने ऑंखो में ऑंसू भरकर कुसुम से पूछा—बहनइन्हें क्या शिकायत हैमैंने तार भेजा। उसका जवाब नहीं आया। रात दो बजे एक जरुरी और जवाबी तार भेजा। दस बजे तक तार-घर बैठी जवाब की राह देखती रही। वहीं से लौट रही थीजब तुम रास्ते में मिली। यह तुम्हे कहॉँ मिल गये?

कुसुम मेरा हाथ पकड़कर दूसरे कमरे में ले गयी और बोली—पहले तुम यह बताओं कि भुवन का क्या मुआमला थादेखोसाफकहना।

मैंने आपत्ति करते हुए कहा—कुसुमतुम यह प्रश्न पूछकर मेरे साथ अन्याय कर रही हो। तुम्हें खुद समझ लेना चाहिए था कि इस बात में कोई सार नहीं है ! विनोद को केवल भ्रम हो गया।

बिना किसी कारण के?’

हॉँमेरी समझ में तो कोई कारण न था।’

मैं इसे नहीं मानती। यह क्यों नहीं कहतीं कि विनोद को जलानेचिढाने और जगाने के लिए तुमने यह स्वॉँग रचा था।’

कुसुम की सूझ पर चकित होकर मैंने कहा—वह तो केवल दिल्लगी थी।

तुम्हारे लिए दिल्लगी थीविनोद के लिए वज्रपात था। तुमने इतने दिनों उनके साथ रहकर भी उन्हें नहीं समझा ! तुम्हें अपने बनाव-सँवार के आगे उन्हें समझने की कहॉँ फुरसत कदाचित् तुम समझती हो कि तुम्हारी यह मोहनी मूर्ति ही सब कुछ है। मैं कहती हूँइसका मूल्य दो-चार महीने के लिए हो सकता है। स्थायी वस्तु कुछ और ही है।’

मैंने अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा—विनोद को मुझसे कुछ पूछना तो चाहिए था?

कुसुम ने हँसकर कहा—यही तो वह नही कर सकते। तुमसे ऐसी बात  पूछना उनके लिए असम्भव है। वह उन प्राणियों में हैजो स्त्री की ऑंखें से गिरकर जीते नहीं रह सकते। स्त्री या पुरूष किसी के लिए भी वह किसी प्रकार का धार्मिक या नैतिक बन्धन नहीं रखना चाहते। वह प्रत्येक प्राणी के लिए पूर्ण स्वाधीनता के समर्थक हैं। मन और इच्छा के सिवा वह कोई बंधन स्वीकार नहीं करते। इस विषय पर मेरी उनसे खूब बातें हुई हैं। खैर—मेरा पता उन्हें मालूम था हीयहॉँ से सीधे मेरे पास पहुँचे। मैं समझ गई कि आपस में पटी नहीं। मुझे तुम्हीं पर सन्देह हुआ।

मैंने पूछा—क्योंमुझ पर तुम्हें क्यों सन्देह हुआ?

इसलिए कि मैं तुम्हे पहले देख चुकी थी।’

अब तो तुम्हें मुझ पर सन्देह नहीं।’

नहींमगर इसका कारण तुम्हारा संयम नहींपरम्परा है। मैं इस समय स्पष्ट बातें कर रहीं हूंइसके लिए क्षमा करना।’

नहींविनोद से तुम्हें जितना प्रेम हैउससे अधिक अपने-आपसे है। कम-से-कम दस दिन पहले यही बात थी। अन्यथा यह नौबत ही क्यों आतीविनोद यहॉँ से सीधे मेरे पास गये और दो-तीन दिन रहकर बम्बई चले गये। मैंने बहुत पूछापर कुछ बतलाया नहीं। वहॉँ उन्होंने एक दिन विष खा लिया।’

मेरे चेहरे का रंग उड़ गया।

बम्बई पहुँचते ही उन्होंने मेरे पास एक खत लिखा था। उसमें यहॉँ की सारी बातें लिखी थीं और अन्त में लिखा था—मैं इस जीवन से तंग आ गया हूँअब मेरे लिए मौत के सिवा और कोई उपाय नहीं है।’

मैंने एक ठंडी साँस ली।

मैं यह पत्र पाकर घबरा गयी और उसी वक्त बम्बई रवाना हो गयी। जब वहॉँ पहुँचीतो विनोद को मरणासन्न पाया। जीवन की कोई आशा नहीं थी। मेरे एक सम्बन्धी वहॉँ डाक्टारी करते हैं। उन्हें लाकर दिखाया तो वह बोले—इन्होंने जहर खा लिया है। तुरन्त दवा दी गयी। तीन दिन तक डाक्टर साहब न दिन-को-दिन और रात-को-रात न समझाऔर मैं तो एक क्षण के लिए विनोद के पास से न हटी। बारे तीसरे दिन इनकी ऑंख खुली। तुम्हारा पहला तार मुझे मिला थापर उसका जवाब देने की किसे फुरसत थीतीन दिन और बम्बई रहना पड़ा। विनोद इतने कमजोर हो गये थे कि इतना लम्बा सफर करीनाउनके लिए असम्भव था। चौथे दिन मैंने जब उनसे यहॉँ आने का प्रस्ताव कियातो बोले—मैं अब वहॉँ न जाऊँगा। जब मैंने बहुत समझायातब इस शर्त पर राजी हुए ताकि मैं पहले आकर यहॉँ की परिस्थिति देख जाऊं।’

मेरे मुँह से निकला—‘हा ! ईश्वरमैं ऐसी अभागिनी हूँ।’

अभागिनी नहीं हो बहनकेवल तुमने विनोद को समझा न था। वह चाहते थे कि मैं अकेली जाऊँपर मैंने उन्हें इस दशा में वहॉ छोड़ना उचित न समझा। परसों हम दोनों वहॉँ चले। यहॉँ पहुँचकर विनोद तो वेटिंग-रूम में ठहर गयेमैं पता पूछती हुई भुवन के पास पहुँची। भुवन को मैंने इतना फटकारा कि वह रो पड़ा। उसने मुझसे यहॉँ तक कह डाला कि तुमने उसे बुरी तरह दुत्कार दिया है। आँखों का बुरा आदमी हैपर दिल का बुरा नहीं। उधर से जब मुझे सन्तोष हो गया और रास्ते में तुमसे भेंट हो जाने पर रहा-सहा भ्रम भी दूर हो गयातो मैं विनोद को तुम्हारे पास लायी। अब तुम्हारी वस्तु तुम्हें सौपतीं हूँ। मुझे आशा हैइस दुर्घटना ने तुम्हें इतना सचेत कर दिया होगा कि फिर नौबत न आयेगी। आत्मसमर्पण करना सीखो। भूल जाओ कि तुम सुन्दरी होआनन्दमय जीवन का यही मूल मंत्र है। मैं डींग नहीं मारतीलेकिन चाहूँ तो आज विनोद को तुमसे छीन सकती हूँ। लेकिन रूप में मैं तुम्हारे तलुओं के बराबर भी नहीं। रूप के साथ अगर तुम सेवा-भाव धारण कर सकोतो तुम अजेय हो जाओगी।’

मैं कुसुम के पैरों पर गिर पड़ी और रोती हुई बोली—बहनतुमने मेरे साथ जो उपकार किया हैउसके लिए मरते दम तक तुम्हारी ऋणी रहूँगी। तुमने न सहायता की होतीतो आज न-जाने क्या गति होती।

बहनकुसुम कल चली जायगी। मुझे तो अब वह देवी-सी दीखती है। जी चाहता हैउसके चरण धो-धोकर पीऊँ। उसके हाथों मुझे विनोद ही नहीं मिले हैंसेवा का सच्चा आदर्श और स्त्री का सच्चा कर्त्तव्य-ज्ञान भी मिला है। आज से मेरे जीवन का नवयुग आरम्भ होता हैजिसमें भोग और विलास की नहींसहृदयता और आत्मीयता की प्रधानता होगी।

तुम्हारी,

पद्मा

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